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Tuesday, January 25, 2022

राहुल राजेश की नई कविताएँ

राहुल राजेश

राहुल राजेश समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी प्रस्तुत कविताओं में कोलकाता शहर के अलग-अलग रंग हैं। उन्होंने इस शहर में रहते हुए इस पुराने शहर को न केवल अपनी सूक्ष्म आँखों से देखा है बल्कि उसे अलग-अलग कोणों से दर्ज भी किया है। कोलकाता शहर पर बहुत सारे कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। न केवल बांग्ला में बल्कि हिन्दी में भी। यहाँ यह कहना जरूरी है कि राहुल की कविताएँ पढ़ते हुए हम उस कोलकाता को देख सकते हैं जो अक्सर हमारी आँखों में नहीं आ पाता। किसी संवेदननशील कवि का किसी शहर को इस तरह दर्ज करना खासा दिलचस्प है और उल्लेखनीय भी।

तो पढ़ते हैं राहुल राजेश की कविताएँ। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही।

 

कलकत्ता
केवल बंग‌-बालाओं का
लावण्य नहीं है कलकत्ता

सोनागाछी से भागकर नेपाल में ‌
बस गयी और वहाँ फँस गयी
उस लड़की का श्राप भी है कलकत्ता

हवा में बेलौस झूलता
हावड़ा ब्रिज भर नहीं है कलकत्ता
लाल लंगोट बाँधकर गंगा में छप्प से
कूद गया शहर भी है कलकत्ता

भातेर घूम में दिन-दोपहर
अलसाता भर शहर नहीं है कलकत्ता
राइटर्स बिल्डिंग के सामने लाल दीघी में
भरी दोपहर बंसी डालकर आँखें गड़ाये
जागता शहर भी है कलकत्ता

केवल बरतानिया के बासी वैभव ढोता
पुरातन अजायबघर नहीं है कलकत्ता
हिंदुस्तान की नई इबारतें लिखने वाला
शुरुआती शहर भी है कलकत्ता

गलत नहीं कह रहा तो
बंगालियों से कहीं अधिक अब बिहारियों
और मारवाड़ियों का शहर भी है कलकत्ता

केवल कॉलेज स्ट्रीट के कॉफी हाउस में नहीं,
फेयरली प्लेस में बेचूजी की चाय दुकान पर उबलता शहर भी है कलकत्ता

सिर्फ सिटी ऑफ जॉय नहीं है कलकत्ता
जीपीओ के दाएँ-बाएँ नानाविध स्वांग भरते
भिखारियों का शहर भी है कलकत्ता

माछ, मिष्टी और रबींद्र संगीत के
रसिकों का ही नहीं, कदम कदम पर अड़े कानूनचियों का शहर भी है कलकत्ता

गुस्ताखी माफ़ हो, सिर्फ इंकलाबों का नहीं,
हड़तालों का शहर भी है कलकत्ता

अब इसे मोहब्बत नहीं तो और क्या कहें
कि बावजूद इसके, मेरी पसंद का
शहर है कलकत्ता!
***

आखेट
वन वन भटक रही है हिरणी
नाभि में कस्तूरी नहीं, प्रेम की अगिन लिये 

काशी के अस्सी में
डुबकी लगा रहा है आखेटक
हुगली के तट पर तय हो गया है मोल
देह की ज्वाला मार देगी उसे पहले ही
यह जानते हुए भी भटक रही है वह

किंचित और छला जाना शेष है-
इसलिए तो उसने स्वप्न में
और एक छलाँग लगा दी है अभी-अभी

टेसू के फूल झर गए हैं
मिट्टी का सिंदूर बनकर
घोड़ों की टापें सुनाई दे रही हैं
लेकिन देह में इच्छाओं की दीमक लग गई है

भला इतनी भी बेसुध होती है
प्रेम में बंगालन? 
***


दिन के दो बजे
कोलकाता के
मिलेनियम पार्क में
बैठे हैं लोग जोड़े में
पेड़ों की धूपछाहीं छाँह में
बतियाते
साथ निभाते
वक्त बिताते
अंतरंगता पाते...

दिन के दो बजे हैं
और जेठ का महीना है
ऊपर दहकता सूरज है
और नीचे गर्म हवा
और बीच में
हरी-हरी,
छोटे-बड़े छेदों से भरी
पेड़ों की छतरियाँ

तनिक दूर आसमान में
हावड़ा ब्रिज का रेखाचित्र है
और बिल्कुल पास गंगा के
कैनवास पर तैरतीं
छोटी-बड़ी डोंगियाँ

ऊमस भरी इस दोपहर में
माथे से पसीना पोंछता
यह कितना सुंदर दृश्य है !
***


गोश्त
बीबीडी बाग से ठीक सटे
फेरी घाट से चलती है लॉन्च
हावड़ा स्टेशन के लिए

वहीं ढलुआ घाट पर नहाते हैं
मुसाफिर, मजूर, औरतें और बच्चे

उनमें से ही कई, दूर तक गोते लगाकर
प्लास्टिक के कैनों में लपक लपककर
भर लाते हैं श्रद्धालुओं के लिए गंगाजल

सुस्ताती लॉन्चों से पानी में कूदते, 
लोहे के भारी-भरकम सिक्कड़ों पर
कमाल के करतब करते
चीतों की तरह लगते हैं जो बच्चे
लड़ते हुए बिल्कुल
कुत्तों में बदल जाते हैं

एक दिन बहकर आ गई थी लाश
जिसे निकालने में लगे थे लोग
शायद डूब गया था वह आदमी

जीवन में पहली बार देखी थी
पानी में फूली लाश
कई दिनों तक मन घबराता रहा...

एक दिन बरसात में उफनती गंगा को
देखते-देखते देखने लगा उन बच्चों को
पानी में ही गुत्थमगुत्था थे जो नंग-धड़ंग

सुनकर सन्न रह गया मैं
जब अपनी जान छुड़ाकर भागते बच्चे ने
पानी में डटे बच्चे को चिल्लाकर कहा-
रंडी का गोश्त !
***

वह लड़की
अपरिचय और अहम के
इस अहमक संसार में
वह लड़की
कम से कम मुस्कुराती तो है
देखकर !

क्या हुआ जो
मैं बालीगंज और वो कालीघाट
लौट जाती है हर शाम
बिल्कुल साथ साथ खड़ी
काली-पीली टैक्सी में बैठकर !!
***

गड़ियाहाट
गड़ियाहाट बोले तो
कलकत्ता का एकदम नामी बाजार

किसी को बोल दो कि
डोवर लेन, गड़ियाहाट में रहता हूँ
तो चौंक के बोलेगा- गोड़ियाहाट मार्केट तो?

आह रे बाबा, बहुत आच्छा जाइगा में
आप रेहता है ! हामलोग तो प्राये वोहाँ
मार्केटिंग कोरने जाता है !

पूजोर बाजार गोड़ियाहाट
ना गेले पूरो हय कि ?

किसी भी घर, किसी भी दफ्तर मेंपोइला 
बैसाख से ही औरतें कहती मिल जाएँगी !
दिल्ली में बरसों बिताकर अब मुकुंदपुर में
बस गई मेरी बड़ी साली साहिबा का भी
दिल कहाँ मानता है ?

लाजपत नगर, सरोजिनी नगर मार्केट की
कमी गड़ियाहाट मार्केट बखूबी
पूरी जो कर देता है !

हफ्ता-दस दिन में तो एक चक्कर
लगा ही लेती हैं और इसी बहाने
मेरी नन्ही बेटियों को मौसी के आने की
खुशी मिल जाती है और पत्नी को
एक जोड़ी नई कनबाली !
और एक मीठी झिड़की भी
कि इतना पास रहकर भी
हमारे भरोसे ही पड़ी रहती हो ?

कहीं से कोई तबादला होकर आए
और वह डोवर लेन में क्वाटर न चाहे
ऐसा हो नहीं सकता !

गड़ियाहाट मार्केट बिल्कुल पास है भाई !
हम भी सात साल बाद आए अहमदाबाद से
तो तय था, पक्का डोवर लेन ही चाहिए
अपने दिनेश भाई भी यहीं हैं और अपना कलकतिया अरिंदम भी तो यहीं है !

सन दो हजार पाँच में जब तीन महीने
रहना हुआ था बालीगंज, सर्कुलर रोड में
तब हम सब जब मन तब उठकर
चले आते थे गड़ियाहाट !

पोर्ट ब्लेयर से नाजिया और सुनीता
गुवाहाटी से मिसेज बरूआ और मौसमी
ट्रेनिंग नहीं, शॉपिंग के लिए ही तो आईं थीं !

गड़ियाहाट ! ओह, तब कहाँ मालूम था
हम कभी आकर रहेंगे इसी गड़ियाहाट में !

एक दिन शाम को अरिंदम ने कहा, 
चलिए, जरा गड़ियाहाट मार्केट घूम आते हैं
ठीक चौराहे के बस स्टॉप पर हम खड़े थे
अरिंदम ने कहा, थोड़ी देर खड़े रहिए यहीं
सिगरेट पीते हम देखते रहे लोगों को
बसों में चढ़ती-उतरती भीड़ को

अरिंदम ने कहा, उस औरत को देख रहे हैं ? 
कौन, बड़ी सी बिंदी वाली ? जो खूब सिंदूर लगाए है और खूब चूड़ी पहने है ?
लगता है, अभी अभी शादी हुई है ! न ?
देखिए, देखिए, अभी उस तरफ गई
उसके साथ ! फिर लौट आई !
देखिए, देखिए, अभी बस में चढ़ी
और तुरंत उतर गई !
अरे हाँ ! कुछ हुआ है क्या ?
नहीं, ग्राहक पटा रही है !!
*** 


ग्लानि
अक्सर आते-जाते
ईस्टर्न रेलवे मुख्यालय के इर्द-गिर्द
दिख जाते हैं वे

सड़कों, फुटपाथों पर लोटते
इन बेघर बच्चों में
इनकी निर्दोष खिलखिलाहटों के सिवा
कुछ भी तो सुंदर नहीं

मैं ग्लानि से भर जाता हूँ हर बार
देखकर उन्हें
मेरी नन्ही बेटियों जैसी तो हैं वे भी
पर मामूली मदद के सिवा
मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाता...

इस ग्लानि का बोझ
मेरी पीठ पर इतना ज्यादा है
कि मैं लाख कोशिशों के बावजूद
तनकर नहीं चल पाता ।
***


हनुमंत राव*के लिए
वहरोज मुझे आइना दिखाता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ

वह मुझे अनसुने फ़साने सुनाता है
इसलिए मैं उससे मिलने जाता हूँ

वह जिंदगी के तराने डूबकर गाता है
इसलिए मैं उसको सुनने जाता हूँ

वह जीने की तमीज सिखाता है
इसलिए मैंउससे सीखने जाता हूँ

वह मुझे उस दुनिया से मिलाता है
जिस दुनिया से मैं मिल नहीं पाता हूँ

वह इबादत का मतलब समझाता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ

वह रोज अपने सरकार से मिलाता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ

वह मुझे कुदरत के करीब लाता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ

वह हर पत्ते में ईश्वर का पता बताता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ

वह मुझे रफ़्ता रफ़्ता इंसान बनाता है
इसलिए मैं उसके पास जाता हूँ । 
***

(*हनुमंत राव एक दिन अचानक कोलकाता के फेयरली प्लेस के पास बेचू जी की चाय दुकान पर मिल गए! वे एक मारवाड़ी फर्म में मामूली पगार पर मामूली-सी नौकरी करते हैं पर वे बात बड़े पते की करते हैं! उनसे जब भी मिलता हूँ, खुद को थोड़ा समृद्ध महसूस करता हूँ।)

वह औरत
मैं लपकता-भागता पहुँचता
तो देखता वह मुझसे पहले पहुँची हुयी है !

जीपीओ के गुंबद के ठीक नीचे कोने में
वह बैठी होती गोद में जाँघ से टिकाये 
नन्हा-सा, गोल-मटोल, सोता बच्चा

मुँह में दूध की बोतल या चूसनी भरे हुए
मैं उसके पसरे हाथ में सिक्के डाल आगे
बढ़ जाता और वह टटोलकर सहेज लेती

गुंबद की घड़ी तब पौने दस बजा रही होती
याद आ जाते कभी-कभी विपिन पटेल साब 
जो अहमदाबाद के आश्रम रोड के समानांतर
बिछी पटरी पर सरकती रेलगाड़ी देख कहते
इसमें रोज भिखारी लोग आते हैं और
इसी से लौट जाते हैं, डेली पसिंजर की तरह

मैं जब पौने छह बजे भागता मेट्रो पकड़ने
तो वह भी बच्चा लिए लौट रही होती

कभी दोपहर में बच्चे को उसी फुटपाथ पर
खेलते-ठुमकते देखता तो मन हुलस जाता
ना, नशे से नहीं, नींद से जागा है बच्चा !

एक दिन शाम को स्ट्रैंड रोड से लौट रहा था
तो देखा, वह धपाधप भाग रही थी हावड़ा को
उसकी नहीं, पति की गोद में था बच्चा !

अरे, तो क्या ये अंधी नहीं है ? 
पहले भौंचक्क हुआ, खीजा, फिर खुश हुआ
कि चलो विधवा नहीं है, भरा-पूरा परिवार है !

उसके थके चेहरे पर संतोष की चमक थी।

मुझे उसके स्वांग का फिर बुरा नहीं लगा
कलकत्ता में सिक्के खोटे नहीं हुए हैं अभी
एक टका के मूढ़ी में एक बेगून भाजा सानकर
मजे से अपनी भूख मिटा लेते हैं लोग

ऐसे ही नहीं कहा गया है
दिल्ली में सत्ता है, मुंबई में पैसा है
तो कलकत्ता में जीवन है !

आँखें भर आई हैं ! गला रूँध गया है !
शुक्रिया कलकत्ता ! शुक्रिया बहुत बहुत !!
***


माफी
काँथा कि बाँधनी कि बालूचरी?

ना ना, कुछ नहीं, कुछ नहीं
किछु ना, किछु ना, सुदू तुमी

विचारों की बग्घी पर सवार होकर
पहुँचा था कवि प्रेम की देहरी पर

आलिंगन के उतावलेपन में भूल गया
अभिमान की जूती उतारना देहरी पर

दुत्कार ही देती वह उसे उसी क्षण
लेकिन माफ कर दिया
कबि मानुष तो ! 
किछु बोला जाए ना !!


 संपर्क:-

जे-2/406, रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास, गोकुलधाम, गोरेगांव(पूर्व), मुंबई-400063 मो. 9429608159

 

 


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Monday, November 29, 2021

यतीश कुमार का दिलचस्प और मार्मिक संस्मरण


गोलगप्पे वाला

पूर्व गोपाल नगर

मंदिर बाजार, 24 परगनापश्चिम बंगाल

 


लगभग छः पुस्तों से ये लोग डायमंड हार्बर से एक घण्टे की दूरी पर रह रहे हैं। यह गांव मुझे सचमुच अजूबा लगा। सियालदह साउथ के सारे रेलवे स्टेशनों पर जो गोलगप्पा, चाट मिलता है वह सारे उसी गाँव से आता है। गाँव की स्त्रियाँ और बुजुर्ग सवेरे तीन बजे उठते हैं और गोलगप्पा छानने की तैयारी शुरू हो जाती है, सुबह सात-आठ बजे तक सब तैयार भी हो जाता है।

घर के जवान लड़के, जो कोलकाता शहर की धूल-गर्द छानकर रात एक बजे लौटते ही हैं, वे भी सवेरे उठकर तैयारियों में उनका हाथ बंटाने लग जाते हैं और फिर दोपहर में साउथ लोकल ट्रेन से कोलकाता आते हैं।  इनके लिए लोकल ट्रेन सचमुच  जीवनदायिनी है। कोविड में ट्रेन की रफ्तार थमने से मानो इनके जिंदगी की रफ्तार थम सी गई हो। इनमें शायद ही किसी को हिंदी आती है। मछली-चावल सबसे ज्यादा पसंद है और इससे ज्यादा की इच्छा भी नहीं रखते, थोड़े में ही संतुष्ट हो जाने वाले हैं, बस एक बात खास है इनमें और वो है पढ़ने की इच्छा।  कहते हैं, मिददा उपनाम का पहला शख़्स इस गाँव में आया था, जो छः पीढ़ियों में 150 परिवारों में बदल गया।  ये सारा कुनबा छोटी- मोटी खेती के साथ-साथ गोलगप्पे, चाट छोला के व्यवसाय में लगा हुआ है।

 


भूमिका से इतर अब मैं असली कहानी पर आता हूँ।  बात साल 2011-12 की होगी। हम सियालदह रेलवे कोलोनी में रहते थे। एक गोलगप्पा बेचने वाला बच्चा गोलगप्पा खाने के दौरान अनौपचारिक बातचीत करते-करते हमारे सम्पर्क में आया। बहुत गम्भीर और बड़ी सोच वाला बच्चा, दूसरों के बारे में, सामाजिक व्यवस्था के बारे में, अपने गाँव के बारे में चिंतित बच्चा। जिसके जीवन का सबसे बड़ा दुख ये है कि वो पढ़ नहीं पाया, घर को सम्भालने और जीवन यापन के लिए उसने गोलगप्पा बेचना शुरू कर दिया। जब हम सियालदह में रहते थे तो वहीं छोटे बस स्टैंड पर ये अपनी दुनिया रख देता था। पत्नी (स्मिता) और बड़ी बेटी मन्नत ने साथ मिलकर घर पर ही  अंग्रेजी की पढ़ाई करवानी शुरू कर दी। आप को विश्वास नहीं होगा उसे सीखने में जितनी खुशी होती थी उतना ही हमें उसे सीखते हुए देखने में। वह बहुत स्वाभिमानी भी था, बहुत मतलब कुछ ज़्यादा ही। उसकी दिली तमन्ना बस यही थी कि जो सरकारी स्कूल उसके गाँव में है, जिसमें शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई नहीं हो पा रही थी, वहाँ क़ाबिल शिक्षक और बेहतर व्यवस्था मुहैया कराया जा सके। मैं यह जानकर हैरान हुआ कि अपनी इस सोच को साकार करने के लिए वो अपनी गाढ़ी कमाई से पैसे बचा रहा है।

 बरसात में पानी से डूबे, गर्मी में पसीने से लथपथ, हर मौसम में ढ़हते-बनते घर, खस्ताहाल स्कूल, अधनंगे बच्चों का समय-कुसमय रिरियाना और हरेक चमकते रैपर के लिए तरसते बच्चे। इन्हें देखकर, प्रौढ़ शिक्षा, ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड, साक्षरता अभियान जैसी अधूरे मन से चलाई गई परियोजनाएँ बेमानी सी दिखने लगती हैं। बढ़ते बच्चों की आकांक्षाएं स्कूलों के फीस के सामने दम तोड़ देती हैं। हर दिन उनके सामने कोई न कोई सपना खंडहर में तब्दील हो जाता है। बहरहाल, इन तमाम कठिन परिस्थितियों में एक बच्चे ने अपने गाँव के स्कूल को बेहतर बनाने की ख़्वाहिश को पकड़ कर रखा है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ यदि हर बच्चा शिक्षित हो गया और सब समझने लगा तो सामंती समाज का क्या होगा?

 हमारे घर आना उसे बहुत अच्छा लगता है। जब भी वो परेशान होता बिना किसी लाग-लपेट के हमारे पास चला आता है। बस हमसे मिलना, बातें करना अच्छा लगता है। स्मिता भी उसे बिल्कुल परिवार के सदस्य की तरह समझती है और स्नेह करती है। पिछले साल मेरे  जन्मदिन बीत जाने के लगभग दस दिन बाद वह विज्ञान के साथ-साथ दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले महान इंसान एपीजे अब्दुल कलाम की जीवनी भेंट स्वरूप ले आया। मेरे जन्मदिन पर मिले उपहारों में वो सबसे बेहतरीन और अनमोल उपहार है। एक गोलगप्पा बेचने वाले की सोच कितनी बड़ी हो सकती है, यह विस्मित करती है। जिसे मुझसे ज़्यादा पुस्तक की अहमियत पता है। उसे प्यार से डाँटते हुए मैंने कहा इतनी महँगी किताब क्यों लाया ! पैसे देने की कोशिश की पर उसने हमारी एक नहीं सुनी। उसकी स्वाभिमानी मुस्कान के आगे हम बस नतमस्तक हो गए।

 उस दिन घर पर साथ खाते-खाते उसने हमें "दो बीघा ज़मीन" कहानी सुनायी। वही "दो बीघा ज़मीन" कहानी जिसे 40 के दशक में सलिल चौधरी ने लिखी थी, तब नाम था रिक्शावाला। बाद में इस कहानी पर फिल्म बनी तो, फिल्म का टाइटल रवींद्रनाथ टैगोर की कविता दुई बीघा जोमी से लिया गया। पूंजीवादी सोच वाले समाज को पृष्ठभूमि बनाकर लिखी गई कहानी के पाठ के बाद उसने बस इतना कहा, कहानी के पात्र अब भी ज़िंदा हैं और संघर्ष जारी है।

 सभी बातें वो इतने सरल हृदय से सुना रहा था कि हम बस उसे देखते रहे। सच पूछिए तो ऐसे लोग ही सही शिक्षा देते हैं। जीवन की शिक्षा, स्वाभिमान की शिक्षा, उद्देश्य की शिक्षा। वो मुझसे पूछता है माइकल मधुसूदन दत्त जी को जानते हैं? आपने पढ़ा है उन्हें? जवाब में मेरी गर्दन झुक जाती है और मैं इतना ही कह पाता हूँ - "नाम सुना है, पर पढ़ा नहीं।" कहता है मैं आपको उनकी किताब लाकर दूँगा। अचानक उठता है, आँखों से ग़ायब हो जाता है, एक धुआँ उड़ाते हुए जिसका ग़ुबार अब भी दृश्य में तैर रहा है।

 


इस साल फिर जन्मदिन के दिन उसने फोन किया और हमें अपने गाँव चलने की ज़िद करने लगा। पिछले चार सालों से वह हमें अपने गाँव आने का प्रेम भरा निमंत्रण देता आ रहा है और हम अपनी ज़बरदस्ती वाली असुविधा का बहाना लिए मना करते आ रहे हैं पर इस बार हम दोनों ने झटके में एक ही जवाब दिया-"हम आ रहे हैं।" हमने अगली शाम मिलने का वादा किया। वह ख़ुशी के मारे फ़ोन पर ऐसे चहचहाने लगा जैसे चिड़ियों की अम्मा दाना लेकर आयी हो। वह बस यही दोहराता जा रहा था कि आप आइएगा न ! भरोसा नहीं हो रहा ! विश्वास नहीं हो रहा कि यह सच होने जा रहा है। उसने डरते हुए बस इतना पूछा कि आप कितने साल के हो गए ।

अगली दोपहर हम पूर्व गोपालपुर के लिए निकल पड़े। रास्ते में सारे खेत पानी में डूबे दिख रहे थे। शहर में बैठ कर जब हम आराम से यहां उगाए अन्न- सब्जियों का इस्तेमाल करते हैं तब हम सब्ज़ियों और फसलों के डूबने और उगने की बात कहाँ सोचते हैं। कुछ दिन पहले ही तो वह अपने खेत की ढेर सारी सब्जियां लेकर घर आया था। डूबे खेतों को देख एक अनजाना डर घेरे जा रहा था कि इन खेतों में कहीं उसका खेत भी न हो।

हम लगभग दिन के ढाई बजे उसके घर पर पहुँचे! एक कमरे का घर, जिसकी छान वो भी कच्ची-पक्की और फर्श बहुत सफाई से गोबर से लिपी हुई। अकेले कमरे वाले घर में भी संयुक्त परिवार ख़ुशी के साथ समाया हुआ था। एक चौकी पर पूरी दुनिया अँटी पड़ी थी। उसकी भाभी, चाची, दोस्त की बीवी और देवी रूपा माँ, सब ने निश्छल प्रेम के साथ हमारा स्वागत किया और हम दोनों निशब्द बस दृश्य में घुले जा रहे थे। भाषायी समस्या धीरे-धीरे अपना दायरा घटा रही थी और अब हम एक दूसरे की भाषा समझने लगे थे। संवाद होठों से उठकर आँखों के माध्यम से हो रहा था। उनमें से सिर्फ़ एक को हिंदी आती थी। वह उसकी भतीजी थी, जिसकी आँखों में एक सार्थक सकारात्मक हठ दिख रहा था और वो निर्भीक आँखों के साथ ज़ुबान से भी बहुत बोलती थी।

 वहीं सामने लीपी हुई ज़मीन पर दो प्लास्टिक की कुर्सियों का इंतज़ाम टेबल के साथ किया गया था, जो उस कमरे में बिलकुल फ़िट नहीं बैठ रही थीं। मुझे कुर्सी पर बैठना थोड़ा अजीब भी लग रहा था इसलिए मैंने ज़मीन पर बैठने का अनुरोध किया, जिसको सविनय अस्वीकार कर दिया गया। हमने फिर ज़मीन पर चटाई बिछा कर एक साथ बैठने की बात की पर कोई तैयार ही नहीं हुआ, सबने बस हाथ जोड़ कर हमें नि:शब्द कर दिया। माँ बस हमें अपलक ताकती हुई आँखों से आशीर्वाद दे रही थीं। उन्हें हमारी बातें समझने में थोड़ा वक़्त लग रहा था। छोटी लड़की दुभाषिये का काम चपलता और चंचलता से कर रही थी। माँ की आँखें ममत्व, संतुष्टि और आत्मीय सुख से लबरेज़ थीं।

 


पिता गौ- सेवा में गए हुए थे। उनके आने पर मैंने उनका पैर छूना चाहा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, उनकी आँखें छलछला उठीं। उनका विनम्र व्यक्तित्व मुझे खींचे जा रहा था। हम अपनी-अपनी भाषा में टूटी फूटी बातें कर रहे थे। उनकी आँखों में कितनी गहराई थी, काली आँखें सुरंग में कितनी ही दास्तानों को दफ़नाए मुस्कुरा रही थीं, उन आँखों में सापेक्ष एक सच्चा इंसान दिख रहा था। उन्होंने बातों-बातों में बताया कि वे दसवीं तक स्कूल गए हैं और स्टेट लेवल पर फ़ुटबॉल भी खेलते थे, पर ग़रीबी ने आगे की पढ़ाई और खेल दोनों को छीन लिया। गौ माता ने ही संभाला और ज़िंदा रखा। उनके घर में आज भी तबला रखा हुआ था जबकि उन्होंने तबला बजाना तीस साल पहले ही छोड़ दिया था। पिता कहते हैं सरस्वती निवास करती है तबला कैसे हटा दें। हाथ में नर्व की समस्या हुई थी, इस कारण तबले का साथ बहुत कुछ छूट गया। उनकी आँखों से छलकती पीड़ा को मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था अतः सायास थोड़ा विषय को बदल दिया।

 जिज्ञासा पूर्वक पूछा कि ये जो खेत डूब गए हैं, उसकी भरपाई सरकार कैसे करती है? मुझे जियोटैगिंग और उससे जुड़ी पॉलिसी के बारे में पता था पर सच्चाई का पता नहीं था। जमीनी सच्चाई जानकर दुख हुआ और गुस्सा भी। अभी तक फसल बीमा योजना के बावजूद कुछ भी पैसा नहीं मिला था, बिना किसी दुःख और पछतावे के दिया गया जवाब मुझे और बेचैन कर रहा था।

 टपकती छत, कच्चा फ़र्श, कोरोना के कारण आई आर्थिक विपदा अलग से (गोलगप्पा महीनों तक नहीं बिका)। इतनी परेशानियों के बावजूद किसी का मुख म्लान नहीं, सब पर सच्चाई की तेज चमक तारी थी। ख़ुशी की कोपलें लिए सब एक समान मुस्कुरा रहे थे। मेरे लिए यह सब एक पहेली की तरह था। जहाँ हम हर छोटी बात पर झुँझला जाते हैं वहीं इनके चेहरों पर तमाम समस्याओं के बावजूद ग़ज़ब की संतुष्टि व्याप्त थी। उन्हें बस इस बात का दुःख था कि बेटा पढ़ नहीं सका पर इस बात गर्व भी था कि वह ईमानदार और मेहनतकश है और अभी भी पढ़ने की इच्छा रखता है।

मेरे जन्मदिन के लिए जो तैयारी उस घर ने की थी उसे देखकर मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया। उनके स्नेह से मैं भीतर तक भीग गया। अच्छे लोग कितने सच्चे और अच्छे हो सकते हैं हम शहर में बैठ कर इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते । ग़ुब्बारों से सजा घर, केक काटते समय फुलझड़ी का जलना, हम सब को तिकोना बर्थडे कैप पहनाना और फिर उसके ऊपर सुरीला गीत। यह सब किसी सपने से कम नहीं था। लोग कहते हैं प्रेम अदीठ होता है, दिखता नहीं सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। मैं एक ट्रांस से गुज़र रहा था।


हमने एक दूसरे को केक खिलाया और अनायास ही गले मिल लिए। चहुँ दिशाओं से ख़ुशियां छलछला रही थीं। सामने एक चूल्हा था और चार स्त्रियां एक साथ जुटी हुई थीं। देसी पकवानों की खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। सब कुछ बिल्कुल सामने पक रहा था और एक-एक कर परोसा जा रहा था। ताड़ के फल से ही चार तरह के पकवान बनाए गए थे जिसे हम पहली बार खा रहे थे। पत्नी पाकशाला के सारे भेद जानने को व्याकुल थीं। स्त्रियां विधि बताने के साथ-साथ पकवान चूल्हे से उतार सीधे हमारे प्लेट में डाल रही थीं। छोटे से कमरे के विस्तृत व्यवस्था का स्वाद हम यही सोच कर बस चख रहे थे कि अगर पूरा खाएंगे तो सारे व्यंजन नहीं खा पाएँगे। वे हमसे अनुरोध कर रहे थे। वहाँ खाना खिलाने की ज़बरदस्ती बिलकुल नहीं थी, जो स्वाद में और ज्यादा मिठास घोल रही थी। खाते-खाते पता चला कि गाय अब बहुत कम दूध देती है उसकी उम्र हो गयी है। मेरे मन में कुछ विकृत प्रश्न उठ रहे थे पर उस पर पानी फेरते हुए एक जवाब तैरता है कि जब हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं था, पिता बीमार रहते थे तब गाय माता ने ही हमें पाला फिर आज हम उन्हें क्यों नहीं पालें। मेरे अंतस को जो प्रश्न उमेठ रहा था वो मैं उनसे पूछ भी नहीं पा रहा था कि शहर में हम अपनी माता के साथ भी ऐसा ही व्यवहार क्यों नहीं रख पाते। मनुष्य निजी तौर क्यों अधिकांशत: स्वार्थी होता है। मैंने उन प्रश्नों की जुगाली कर ली।

 


खाने के बाद हम पूरा गांव घूमने निकले। गाँव में सब घर एक से ही लग रहे थें। पूरे हक़ के साथ हमें सभी घरों में ले जाया जा रहा था। समुदाय में पाँच-छः चूल्हों के साथ गोलगप्पा बनाने का सामूहिक किचन भी था। रास्ते में हमने चार पाँच बार बंसी से मछली पकड़ा और उसे वापस उसी  पोखर में डाल दिया। आगे मूर्तियाँ बन रही थीं। हमें ऐसे दिखाया जा रहा था जैसे हम मूर्तिकार के घर के ही मेहमान हों।  थोड़ा और आगे अब मूर्तियों ने रेज़िन का माध्यम पकड़ लिया था। महात्मा बुद्ध का निर्माण आधे रास्ते था पर अधर पर मुस्कराहट पूरी थी । पूरी तरह तैयार सात फीट के हनुमान, बाहर सड़क पर पानी के किनारे ऐसे खड़े थे कि बस अब उड़ जायेंगे। शहरी आदमी मिलते ही पहले दाम पूछता है। दाम सुनकर मैं थोड़ा पीछे हट गया। सुकून मिला कि कला का मोल अब भी है यहाँ।

 हमें बार-बार एहसास कराया जा रहा था कि गाँव में एक दूसरे का ख़्याल कैसे रखते हैं। शाम को एक जुट हो बैठते हैं, राजनीति से रणनीति सब पर चर्चा होती है। एक घर का बनाया विशेष खाना दूसरे घर अपने आप पहुँच जाता है। वो चंचल आँखों वाली लड़की तपाक से कहती है कि माँ का बनाया खाना नहीं अच्छा लगता तो चाची या भाभी किसी के यहाँ जाकर खा लेती हूँ। इन बातों को अगर कोई कहता तो मैं कहानी ही मानता, पर प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या !

गाँव भ्रमण कर वापस उसके घर लौटा तो कोलकाता लौटने का वक्त हो आया। कितनी कहानियाँ एक साथ खड़ी थीं, जिनका ज़िक्र नहीं कर रहा हूँ। बस उस बच्ची से लगातार बातें किये जा रहा था। वो दसवीं में पढ़ रही थी और आत्मविश्वास से लबरेज थी कि उसे बहुत आगे तक पढ़ना है। मैंने उससे एक अबोला वादा लिया और शुभाशीष के साथ अपने होने की मौन सांत्वना । अपने भविष्य के सपनों को लेकर वो बहुत सजग है।

 हम दम्पत्ति बोलने की स्थित में नहीं थे। सबकी आँखों से स्नेह, प्रेम, आशीर्वाद उमड़ रहा था और हम उस घर से ऐसे विदा हो रहे थे जैसे स्मिता अपने मायके से लौट रही हो। हमारे साथ लौट रही थी उनके व्यक्तित्व की निश्छलता, अपार प्रेम, अविरल स्नेह, अदीठ आशीर्वाद, संतुष्टि की बारिश, विषम परिस्थितियों में खिली मुस्कानों की लड़ी, रिश्तों के सही मायने और सुनील गंगोपाध्याय की 100 डेज, जिसे आते समय उस बच्चे ने लाख मना करने पर भी जन्मदिन की भेंट स्वरुप दे ही दिया और मैं फिर निशब्द लौट आया।

 काश! हमारे यहाँ एक बार फिर कृष्ण-सुदामा एक ही स्कूल में समान सुविधाओं के साथ शिक्षा प्राप्त करें, मानवीय मूल्यों को समान तौर पर जी पाएँ। योग्यता कई बार प्रमाण-पत्र की भेंट चढ़ जाती है। अमीर बच्चे कार में कोका-कोला पीते गरीब बच्चों को बाय-बाय कहकर सर्राटे से उड़ जाते हैं। सड़क से संसद तक के नेताओं के भाषणों में शिक्षा और उससे जुड़े सुधार की बात की जाती है, पर उन लंबी बयानबाजी का शिक्षा से कुछ लेना-देना ही नहीं है। शिक्षा जैसे-जैसे महंगी हो रही है, सपने संकुचित होते जा रहे हैं।

 पर आँखें हैं तो सपने हैं और इसी बीच ख़बर पढ़ रहा हूँ कि कटिहार के लड़के ने आई ए एस टॉप किया.....।


यतीश कुमार

लेखक चर्चित कवि एवं समीक्षक होने के साथ नीलांबर कोलकाता के वर्तमान अध्यक्ष हैं। हाल ही में आई उनकी कविता पुस्तक अंतस की खुरचन खासी चर्चे में है।


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, November 19, 2021

कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन पर मृत्युंजय पाण्डेय का एक रोचक संस्मरण

बाघ से भेंट
 मृत्युंजय पाण्डेय



कवि केदारनाथ सिंह मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं । मेरे ही क्या वे बहुतों के प्रिय कवि हैं । बहुतों के आदर्श भी । उनसे बहुत ज्यादा मिलने या बोलने का अवसर मुझे कभी नहीं मिला । अवसर तो बहुत ज्यादा सुनने का भी नहीं मिला । इन सबके बावजूद मैं इतना कह सकता हूँ, मैंने केदारनाथ सिंह को देखा है, उन्हें कविता पढ़ते हुए सुना है, उनके साथ चला हूँ, उनके पास बैठकर चाय पी है । यह बातें जब मैं अपने विद्यार्थियों को बताता हूँ मेरे अंदर गर्व का बोध होता है । वे आश्चर्य से मुझे देखते हुए पूछते हैं— ‘आप सचमुच कवि केदारनाथ सिंह जी से मिले हैं ?’ मैं कहता हूँ कि मैं नामवर सिंह से भी मिला हूँ तो उन्हें और आश्चर्य होता है । दुख मुझे इस बात का है कि मैं हजारी प्रसाद द्विवेदी से नहीं मिल पाया । रेणु को देख नहीं पाया । दुख तो कइयों से न मिल पाने का है और हमेशा रहेगा । खैर, बात हो रही थी केदार जी की । केदारनाथ सिंह से मिलने की बात सुनकर वे मुझे इस कदर देखते हैं, मानों मैं किसी कवि से नहीं बल्कि बाघ से मिल आया हूँ । इसका एक कारण यह भी है कि वे केदार जी को बाघ के रूप में ही जानते थे । बाघ उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी । चुनौती तो हमारे शिक्षकों के लिए भी थी (है) । बाघ से वे इस कदर डरते थे कि उसके पास फटकने से भी डरते थे । उन्हें डर था कि ढलती शताब्दी के पंचतंत्र के बीच कहीं वे भी न फँस जाएँ ! और विद्यार्थी की एक टुकड़ी बाघ को किताबों-लाइब्रेरियों में खोजा करती थी । पर, उन्हें क्या पता बाघ किसी किताब में नहीं, बल्कि कथा कि ओट में छिपा बैठा है । पर, उन्हें कथा तक ले जाने वाला भी कोई नहीं था । बाघ उन्हें गन्ने के खेत में भी मिल सहता था, लेकिन प्रोफेसरों के लिए यह तो कथा-कहानी से भी मुश्किल काम था । इस दृष्टि से केदार जी उनके लिए असाधारण थे । वे केदारनाथ सिंह को कवि के रूप में कम बाघ के रूप में ज्यादा जानते थे । खैर, डरने को तो हमारे शिक्षक उदय प्रकाश के सांड से भी डरते थे । डर उन्हें इस बात का था कि वे उसके पास जाएँ और वह उन्हें पटक दे तो क्या हो और ऐसा पटके कि फिर उठ ही न पाएँ । इसलिए वे हमेशा अपने आप को इन सब खतरों से दूर रखते थे । बाद के दिनों में शिक्षकों के डर को देखते हुए सांड को इंग्लैंड विदा कर दिया गया और बाघ अभी भी अपनी जगह बनाए हुए है । आखिर वह है तो बाघ न । इतनी जल्दी तो जाएगा नहीं । जाते-जाते जाएगा । सांड को विदा करने के बाद अब प्रार्थना की जा रही है । और हाँ, बीच-बीच में टेपचू दिख जाता है । पर, ‘मोहनदास नहीं दिखता । यह भी कह लें लोग नहीं चाहते वह दिखे । टेपचू प्रतीक है— मारने औए जीने का । जिसे आप सभ्य भाषा में जिजीविषा भी कह सकते हैं । अर्थात मानो हमें समझाया जा रहा हो, यह व्यवस्था तुम्हें बार-बार मारेगी, पर तुम हर बार जी जाना ‘...और अंत में प्रार्थना करना । इसके अलावा तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है । तुम्हारे सारे रास्ते बंद हैं । 

      एम. ए. के दिनों में बाघ की इस पंक्ति को हम बार-बार दुहराते थे—

                  सच्चाई यह है कि हम शक नहीं कर सकते

                  बाघ के आने पर

                  मौसम जैसा है

                  और हवा जैसी बह रही है

                  उसमें कहीं भी और कभी भी  

                  आ सकता है बाघ

                  पर सवाल यह है

                  कि आखिर इतने दिनों बाद

                  इस इतने बड़े शहर में  

                  क्यों आया था बाघ ।

लाख दुहराने के बाद भी बाघ समझ में नहीं आता था । मेरे लिए केदारनाथ सिंह से मिलना बाघ से मिलने जैसा था । लेकिन हिंसक या खूँखार बाघ से नहीं, बल्कि खरगोश की तरह मुलायम जिंदा बाघ से । हँसते, बोलते, मुस्कुराते बाघ से । खाते-पीते बाघ से । और एक दिन हम तक खबर पहुँची शहर (कलकत्ता) में आ गया है बाघ । हम इस खबर पर विश्वास करते हुए बाघ से मिलने को उत्सुक हो उठे । बाघ के आने की खबर सुनकर आत्मा में जो खुशी हुई थी, उसे बता नहीं सकता ।

      चूँकि एम. ए. के दिनों में तार सप्तक से भी हमारा परिचय हो गया था । तीसरा सप्तक में केदार जी की एक कविता है नये दिन के साथ—यह कविता मुझे पूरी याद थी । बड़े चाव से इसे सुनाया करता था । यह कविता आज भी बहुत-थोड़ा याद है—

                  नये दिन के साथ—

                  एक पन्ना खुल गया कोरा हमारे प्यार का !

                  सुबह,

                  इस पर कहीं अपना नाम लिख दो !

                  बहुत से मनहूस पन्नों में इसे भी कहीं रख दूँगा !

                  और जब-जब हवा आ कर

                  उड़ा जाएगी अचानक बंद पन्नों को—

                  कहीं भीतर मोर-पंखी की तरह रक्खे हुए उस नाम को

                  हर बार पढ़ लूँगा ।  

उस समय केदार जी और अशोक वाजपेयी की कविताएँ मैं खूब पढ़ता था । यहाँ तक कि कविताओं की मैंने एक कॉपी बना रखी थी । (मेरी वह कॉपी भी खो गई) उस कॉपी को मेरे क्लास के सभी मित्र लेकर पढ़ चुके थे । विशेष रूप से लड़कियाँ । अशोक वाजपेयी की मैं सिर्फ प्रेम कविताएँ पढ़ता था । उन दिनों से ही केदार जी की दो कविताएँ मुझे बहुत प्रिय हैं । पहली हाथ और दूसरी जाना । अशोक वाजपेयी की विदा और स्टेशन पर विदा कविता मैं कइयों को सुना चुका हूँ । उसी समय मैंने अपने जीवन का पहला लेख लिखा था । रेणु की कहानी तीसरी कसम पर । इस आलेख में केदार जी और अशोक वाजपेयी की कविताओं का खूब प्रयोग किया है । इस आलेख को एकांत श्रीवास्तव ने वागर्थपत्रिका में प्रकाशित किया था । आज केदार जी हमारे बीच नहीं हैं । उनके जाने के बाद सचमुच लगता है कि जाना हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है ।केदार जी को हमने विदा कर दिया है । पर केदार जी थोड़ा-सा हमारे पास रह गए हैं । उनकी हँसी, उनकी आँखों की चमक’, उनका मौन, ‘छंद की तरह गूँज रहा है । अगर यह कहूँ कि आने वाले दिनों में कवि केदारनाथ सिंह कथा की तरह जीवित रहेंगे तो कुछ गलत न होगा ।

      केदारनाथ सिंह का नाम मैंने पहली बार बी. ए. के दिनों में वेद रमण सर के मुँह से सुना था । पहली बार केदार जी से मिलना भी उन्हीं के माध्यम से हुआ । संभवतः पहली बार उन्हें हिन्दी मेला में देखना, सुनना हुआ था । केदार जी को देखकर बहुत-थोड़ा चकित हुआ था । हिन्दी का इतना बड़ा कवि और ऐसी कद-काठी । वे खादी का कुरता, पाजामा और जैकेट पहने हुए थे । एकदम ग्रामीण व्यक्ति की तरह दिख रहे थे । उनका ग्रामीणपन तथाकथित आधुनिकता के विरुद्ध मूल्य की तरह लग रहा था । मन में कौंधा था, ‘बाघ इतना सहज-सरल कैसे हो सकता है ! वे बहुत धीरे-धीरे एवं आराम से बोल रहे थे । कहीं कोई हड़बड़ी नहीं । बोलने की कोई जल्दी नहीं थी । गाल पर हाथ रखे शांत मन सभी को सुन रहे थे । नए कवियों को वे ध्यान से सुनते थे, मेरे देखने में कभी किसी को हतोत्साहित नहीं किया । कमजोर रचना में भी वे कुछ अच्छी पंक्तियाँ निकाल लेते थे और उससे सबको चकित कर देते थे । एक बड़ा कवि या रचनाकार कैसा होता है या कैसा होना चाहिए यह केदार जी को देखकर जाना । केदार जी मितभाषी थे । वे जटिल से जटिल बात को भी मितभाषा में बोधगम्यता के साथ रखते थे । कविता, संगीत और अकेलापन तीनों उन्हें बेहद प्रिय था । एक कवि के भीतर ये तीनों चीजें होनी ही चाहिए । हम जानते हैं केदार जी शुरू में गीत लिखा करते थे । प्राइमरी स्कूल में ही केदार जी को मैथलीशरण गुप्त और रामनरेश त्रिपाठी जैसे कवियों की काव्य-पंक्तियाँ प्रभावित कर रही थीं । इनकी कविताओं का संगीत केदार जी को अत्यंत प्रिय था । शुरुआती दिनों की उनकी एक गीत याद आ रही है—

                  धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे

                  उगेंगे हमारे खेत में

                  आना जी बादल जरूर !

                  ...    ...    ...

                  आना जी बादल जरूर !

                  धान कंपेंगे कि प्रान कंपेंगे

                  कंपेंगे हमारे खेत में

                  आना जी बादल जरूर !

चकिया, दिल्ली और कलकत्ता तीनों उनके घर रहे । लगाव के मामले में चकिया उनके दिल के सबसे करीब रहा और सबसे अधिक दूर वे उसी से रहे । आजीवन वे उसे भुला नहीं पाए । जीवन के अंतिम समय तक उनकी यह कोशिश रही कि उनके गाँव की धूल उनके बदन से झरने न पाए । उनका भोलापन उनसे दूर न हो । छल और धूर्तता उन्हें छूने भी न पाए और वे अपने इस यत्न में सफल रहे । उन्हें ताउम्र इस बात का दुख रहा कि वे जिन लोगों के लिए कविताएँ लिखते हैं, उन तक ये कविताएँ कभी नहीं पहुँचेंगी । गाँव आने पर वे सोचते हैं—

क्या करूँ मैं ?

क्या करूँ, क्या करूँ कि लगे

कि मैं इन्हीं में से हूँ

इन्हीं का हूँ

कि यही हैं मेरे लोग

जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में

और यही लोग जो मुझे कभी नहीं पढ़ेंगे ।

वे सारा जीवन कविता और आम आदमी की दूरी को पाटने की कोशिश में लगे रहे । कभी बढ़ई पर कविता लिखी तो कभी टमाटर बेचने वाली बुढ़िया पर । यानी, आम आदमी उनके लिए कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है । वे अपने शब्दों को पूरी ताकत के साथ आम आदमी की तरफ फेंकते हैं । कलकत्ता दूसरे स्थान पर रहा और दिल्ली शायद तीसरे स्थान पर । यद्यपि जीवन का अधिकांश समय उनका दिल्ली में ही बिता । दिल्ली ने ही उन्हें अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य दिया । कार्यक्षेत्र और कर्मक्षेत्र उनका दिल्ली ही रही । वह यह भी स्वीकार करते हैं कि जितना सुंदर गाँव यहाँ से (दिल्ली) दिखाई देता है, उतना शायद वहाँ बैठकर नहीं । वे दिल्ली में बैठकर गाँव को देख रहे थे । दिल्ली उनकी कविता में उजास ला रही थी । हमेशा चकिया और कलकत्ता के बीच में दिल्ली आती रही । बनारस कभी नहीं आया । जबकि उनकी शिक्षा-दीक्षा बनारस में हुई थी । यहीं वे हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, त्रिलोचन और नामवर सिंह से मिले । उनके कवि बनने में त्रिलोचन और नामवर सिंह का विशेष योगदान रहा । इस बात को केदार जी कई बार दुहरा चुके हैं । सुधीश पचौरी की भाषा में कहूँ तो त्रिलोचन केदार जी के लिए पहेली भी हैं और गुरु भी । यहीं उन्होंने भोजपुरी के महत्त्व को जाना । पर, छात्र जीवन से ही बनारस की शहराती जिंदगी उन्हें रास नहीं आई । हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह के निकाले जाने के बाद वे अपने आप को वहाँ अकेला महसूस करने लगे । ठंड के मौसम में केदार जी दिल्ली से कलकत्ता आ जाते थे । अपनी बहन के घर । जो बी. ई. कॉलेज के पास है । खुला-खुला अपने में सबको समाहित करता हुआ । केदार जी को करीब से देखने का मौका पहली बार यहीं मिला । यह अवसर भी वेद रमण सर के कारण ही मिला । वेद सर उनके बहुत करीब थे । और मुझे बाघ से मिलने की बहुत उत्सुकता थी । उसे करीब से देखना, महसूस करना चाहता था । वेद रमण सर, कुछ मित्र और मैं केदार जी से मिलने उनके घर पहुँचे । हावड़ा-बी. गार्डेन मिनी बस पकड़कर हम उनके घर पहुँचे थे । बी. ई. कॉलेज के पास उतरकर थोड़ा पैदल चलना पड़ा था । घर की शिनाख्त उसकी बनावट और काली मंदिर से की गई थी । पंक्ति में खड़े वहाँ के सारे घरों के वह भिन्न था । वह एक ऐसा घर था जो महानगर में भी गाँव का अहसास दिला रहा था । आँगन वाला घर था वह । घर से आसमान दिखता था । शायद इसीलिए चकिया के बाद, कलकत्ता उन्हें बेहद प्रिय रहा । घर उन्हें हर वर्ष अपने पास बुला लेता था । उसके बुलावे को केदार जी टाल नहीं पाते थे । कलकत्ता अपने प्रिय कवि को पाकर और गुलजार हो जाता था । उस ठंड में केदार जी की कविता ऊष्मा का काम करती थी कलकत्ता वालों के लिए । केदार जी कलकत्ता जितने दिन रहते उतने दिन जगह-जगह बुलाये जाते और सहज इतने कि वे जाते भी हर जगह । एक बार वे जयपुरिया कॉलेज में भी गए थे । उपहार स्वरूप उन्हें कुछ पुस्तकें भेंट दी गई थीं जो किसी भी तरह से उनके लायक न थीं । पर वे उसे भी अपने साथ ले गए । मुझे याद है एक बार केदार जी को कलकत्ता विश्वविद्यालय में भी बुलाया गया था । बच्चे एक स्वर में बाघ के विषय में पूछ थे । आप सब तो केदार जी को जानते ही हैं, वे अपनी रचनाओं पर कभी कुछ नहीं बोलते । सो यहाँ भी मौन रहे । अपने चीर-परिचित अंदाज में । बच्चों को बाघ वहाँ भी शांत ही मिला, अपने स्वभाव के अनुकूल । पर, बच्चों को प्रतिकूल लग रहा था । केदार जी सबसे सहज बच्चों से संवाद करते हुए दिखे मुझे । वे बच्चों से ज्यादा खुलते थे और शायद जल्दी घुल भी जाते थे । उनके अंदर एक शिशु हमेशा विद्यमान रहा । जिज्ञासु शिशु । वे अपनी कविताओं की तरह इशारों में ज्यादा बातें करते थे । उनकी कविताओं में जगह-जगह इशारे भरे परे हैं । वे खुलकर नहीं बोलते । वे हमेशा दूसरों की बातों का जवाब देने से बचते रहे । वे सामने वाली की सुनते थे और अपनी कहते थे । उनका मानना था लेखक की राजनीतिक विचारधारा अवश्य होनी चाहिए । राजनीतिक विचारधारा का मतलब कतई यह नहीं है कि आप राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण करें । राजनीतिक विचारधारा का विस्तार करते हुए वे उसे सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हैं । यानी, वे संस्कृति को राजनीति से अलग करके नहीं देखते । बिना सांस्कृतिक-राजनीतिक विचारधारा के आप चीजों को ठीक से नहीं देख-परख सकते ।

     


एकबार केदार जी के सम्मान में सलकिया विक्रम विद्यालय में लिट्टी-चोखा का भोज रखा गया था । इस भोज में आसपास के कुछ प्रतिष्ठित पढ़े-लिखे लोगों को आमंत्रित किया गया था । जिसमें मुझे भी बुलाया गया था । ग्यारहवीं-बारहवीं का यह मेरा विद्यालय रहा है । इस विद्यालय से कई प्रतिभाशाली लोग निकले हैं । पत्रकार राजकिशोर और आलोचक शंभुनाथ यहीं से पढ़कर निकले हैं । इस स्कूल ने कई डॉक्टर भी दिये हैं । इस स्कूल में निराला, नागार्जुन, महादेवी, शिवमंगल सिंह सुमन से लेकर केदारनाथ सिंह, अरुण कमल, अशोक चक्रधर और उदय प्रकाश जैसे साहित्य के नामचीन लोग आ चुके हैं । स्कूल के आँगन में सबको लिट्टी-चोखा खिलाया गया था । केदार जी थोड़ा विलंब से आए थे । उनके लिए टेबल-कुर्सी की व्यवस्था की गई थी । जो प्रसंग का जिक्र मैं करना चाहता हूँ वह यह कि स्कूल के बगल में कुम्हारों की एक बस्ती थी या कहें कुछ कुम्हार रहते थे । वे चाय पीने का भाड़ बनाते थे । केदार जी थोड़ी देर बाद वहाँ उपस्थित थे । वे कुम्हारों से गप्पे लड़ा रहे थे । उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे । कुम्हार इस बात से अनजान थे कि वे हिन्दी के सबसे बड़े कवि से बतिया रहे हैं और मजे की बात यह कि केदार जी उनसे भोजपुरी में बोल-बतिया रहे थे । देश से निकलकर वे घर में आ गए थे । हिन्दी उनके लिए देश है और भोजपुरी घर । इतने सहज थे केदार जी । वे अध्यापकों की मंडली छोड़ कुम्हारों के बीच उपस्थित थे । उनकी सुन और अपनी कह रहे थे । 

      आलोचक अरुण होता के बुलावे पर एकबार केदार जी बारासात विश्वविद्यालय में भी गए थे । उस सेमिनार में प्रिय कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव जी भी उपस्थित थे । केदार जी ने बहुत ही सहजता से समकालीन हिन्दी कविता पर अपने गंभीर विचार रखे थे । ढेर सारी बातों के बीच उन्होंने कहा था— मैं तो...थोड़ा-सा देशद्रोही हूँ, क्योंकि जे. एन. यू. का हूँ । जे. एन. यू. का ठप्पा लगा दिया गया है । जो...मैं पूरे दावे से कह सकता हूँ । 25-30 वर्षों से मैंने सेवा की और आज भी कर रहा हूँ विशविद्यालय की । जे. एन. यू. सबकुछ हो सकता है, देशद्रोही कदापि नहीं हो सकता । बीच-बीच में वे अपने शिष्य जितेन्द्र जी से चुटकी भी ले रहे थे । गुरु-शिष्य का यह संबंध मुझे बहुत अच्छा लगा । उस सेमिनार में मैंने समकालीन हिन्दी कविता में लोक विषय पर पेपर पढ़ा था । लेकिन मेरे पेपर पढ़ने के समय केदार जी चले गए थे । केदार जी प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे और मुझे दूसरे सत्र में पेपर पढ़ना था । बड़ी इच्छा थी, उनकी अध्यक्षता में पेपर पढ़ने की, पर वह इच्छा भी पूरी नहीं हुई । लेकिन खुशी इस बात की भी है कि जब मैं मंच पर था, तब मेरे प्रिय कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव जी मंच पर उपस्थित थे । जितेन्द्र जी को मैं केदार जी की परम्परा को आगे बढ़ाने वाला, उसमें बहुत कुछ नया जोड़ने वाला कवि मानता हूँ ।     

      खैर, चलिये चलते हैं, कवि के कमरे में । बी. ई. कॉलेज के पास वाले घर के जिस कमरे में केदार जी बैठे हुए थे उसका दरवाजा उत्तरमुखी था । सारे घर से कुछ अलग पर घर को जोड़ता हुआ । कमरे में दाखिल होते ही पहली नजर केदार जी पर पड़ी । वे बिस्तर पर बैठे हुए थे । शायद पलंग या चौकी थी वह ठीक-ठीक याद नहीं । हमें कुर्सी पर बैठने का इशारा किया । एक कवि के साथ बैठने का यह पहला सुख था । इस सुख को ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता । उस कमरे में बातें तो बहुत हुईं पर याद कुछ भी नहीं है । मैं तो साक्षात बाघ को देख रहा था । उनकी एक-एक हरकत को, उनकी एक-एक भंगिमा को आत्मसात कर रहा था । कुछ देर बाद उनकी बहन हम सभी के लिए चाय लेकर आईं । यह चाय केदार जी के लिए नहीं थी । पर केदार जी चाय पी रहे थे । उनका कप पलंग/चौकी के पीछे था । जिसे वे थोड़ी-थोड़ी देर बाद उठाकर चुस्की लेते थे । मैं इस बात को नहीं समझ पा रहा था कि केदार जी की चाय हमारी चाय के साथ क्यों नहीं आई और वे अपनी चाय को हमारी चाय के साथ क्यों नहीं मिला रहे हैं । खैर, बाद में जाकर पता चला वह चाय नहीं थी । चुकी हम संध्या समय केदार जी से मिलने गए थे और संध्या समय केदार जी कुछ और लेते थे । यद्यपि वे पूरी तरह से सतर्क थे, हम यह न जानने पाएँ कि वे क्या पी रहे हैं । हम जाने लेकिन खुद से नहीं ।

      कुछ समय पश्चात उन्होंने कहा— चलो टहलते-टहलते बातें करते हैं । हम बी. ई. कॉलेज के गार्डेन में दाखिल हुए । केदार जी जितने दिन कलकत्ता रहते थे, संध्या समय बी. ई. कॉलेज के गार्डेन में जरूर टहलते थे । शायद यह उनकी रोज की रूटीन थी । केदार जी वहाँ थोड़ा खुले । मानो बाघ प्रकृति के साहचर्य में आकर अपने को मुक्त पा रहा हो । प्रकृति की वजह से ही उन्हें जे. एन. यू. भाता था । प्रकृति की गोद में जाकर उन्हें ऐसा लगता था, वह अपने गाँव में हों । प्रकृति के साथ ताक-झाँक करना उन्हें बहुत पसंद था । उनका मानना था— मनुष्य के पास अपनी संवेदना को जिंदा रखने के लिए प्रकृति से बड़ा आधार कोई नहीं है ।वे प्रकृति के साथ सहगमन करते थे । चहलकदमी करते हुए मेरे एक मित्र ने केदार जी से बाघ के बारे में पूछा, आप याकिन कीजिए बाघ गुर्राया । उसे अपने बारे में बोलना ठीक नहीं लगा । अपने बारे में न बोलकर केदार जी सारा जीवन सबकी ओर से बोलते रहे । उनका कहना था, ईश्वर ने उन्हें अपनी ओर से बोलने की इजाजत नहीं दी  है ।

      बी. ई. कॉलेज के गार्डेन की ठंडी बयार और खुली जगह बाघको भा रही थी । वह अपने आप को ज्यादा सहज महसूस कर रहा था । मानो उस कमरे में बाघ का अस्तित्व अँट नहीं पा रहा था । हम बाघ के साथ टहल रहे थे । हम बाघ से बतिया रहे थे । हम बाघ को छू रहे थे । बाघ हमारे बहुत करीब था । बी. ई. कॉलेज में टहलते हुए शायद केदार जी सोच रहे होंगे—

                  यह हवा

                  मुझे घेरती क्यों है?

                  क्यों यहाँ चलते हुए लगता है

                  अपनी साँस के अंदर के  

                  किसी गहरे भरे मैदान में चल रहा हूँ ।

थोड़ी देर बाद हम लौट आए । पर मैं पूरा नहीं लौटा । मैं उस रूप मैं नहीं लौटा, जिस रूप में बाघ से मिलने के पहले था । मेरे अंदर बहुत कुछ परिवर्तित हो चुका था । बाघ मुझे बार-बार परेशान कर रहा था । वह मुझे अपनी ओर खींच रहा था । उसकी चाल, उसकी बात, उसके हाव-भाव मुझे बार-बार उसके पास ले जा रहे थे । बाद मैं बहुत इच्छा के बावजूद मैं उनसे नहीं मिल पाया । एक हिचक सदा बनी रही । देखा तो कई बार । सुना भी । पर, पास जाने का मौका नहीं मिला । केदार जी फोटो खिंचवाते वक्त बहुत सतर्क हो जाते थे । अच्छी फोटो आए इसके लिए वे हमेशा सचेत रहते थे । कई बार फोटो देखते भी थे । किसी भी फोटो में वे आड़ी-तिरछी नहीं दिखेंगे । अफसोस मेरे पास साथ की कोई फोटो भी नहीं है ।

      केदार जी के देहांत के बाद उधर कई बार जाना हुआ । बस से उतरते ही पहली नजर उधर ही उठती है । एक बार कल्पना के साथ गया था । बस से उतरकर मैंने हाथ उठाते हुए कहा— केदार जी का घर उधर ही है । वे हर साल यहाँ आते थे । पर अब नहीं आ पाएंगे । कल्पना ने कहा— केदार जी अनुपस्थित होकर भी उपस्थित हैं । इच्छा थी कल्पना को बाघ का ठिकाना दिखाऊँ, पर न दिखा पाया । सोचा, ‘बाघ के बिना बाघ का ठिकाना देखकर क्या होगा । कैसा सुना-सुना लगेगा है न ? फिर कभी-कभी सोचता हूँ, एक बार देख आऊँ । एक बार मिल आऊँ । 

      अंतिम बार केदार जी को कवि विमलेश त्रिपाठी की कविता संग्रह कंधे पर कविता के लोकार्पण समारोह में देखा था और वह देखना सदा के लिए अंतिम हो गया । मैं इस बात को बिल्कुल नहीं जानता था कि अब उन्हें कभी नहीं देख पाऊँगा । उनसे मिलना कभी नहीं हो पाएगा । पर मेरे मन में बसा बाघ सदा जिंदा रहेगा । मेरी स्मृतियों में । पर विस्मृति के लिए कतई नहीं । केदार जी न होकर भी हैं । मैं उन्हें आज भी देखता हूँ । उनसे मिलता हूँ । बतियाता हूँ । यह संस्मरण लिखते हुए नीम के पत्ते झरे बिना ही, ‘मन की उदासी बढ़ने लगी है । 

 

मृत्युंजय पाण्डेय

लेखक देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित एवं 'केदारनाथ सिंह का दूसरा घर' सहित कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के रचयिता हैं।


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad