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Tuesday, July 27, 2021

हंस कथा सम्मान से सम्मानित जयश्री रॉय की कहानी - माँ का कमरा

जयश्री रॉय
जयश्री रॉय की कहानियाँ हम अनहद कोलकाता पर पहले भी पढ़ चुके हैं। जयश्री रॉय हिन्दी की चर्चित कथाकार हैं। उनकी कहानियों का रेंज बहुत व्यापक है। अपनी भिन्न कहन एवं अलहदा शिल्प की बदौलत वे हिन्दी कथा साहित्य में अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। अभी-अभी उन्हें प्रतिष्ठित राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई है। अनहद कोलकाता उनकी इस उपलब्धि के लिए बधाई प्रेषित करता है। आज हम उनकी वही कहानी पढ़ेंगे जिसपर उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही।

                                    

                                     


                            माँ का कमरा                                  

 जयश्री रॉय        

         

माँ का रक्त शून्य चेहरा अस्पताल की सफ़ेद चादर से घुल-मिल कर तकिये का हिस्सा लग रहा! पलकहीन आँखें, बंद और काँपती हुई... नीलांजना देखती है गले में उठते गोले को घोंटते हुये। डॉक्टर ने कहा है, वह नहीं बचेगी... बस कुछ दिन या शायद एक-आध महीना! उनका अक्युट ब्लड कैंसर लिंफ नोडस, कलेजा, स्नायु तंत्र तथा शरीर के अन्य अंगों में पूरी तरह फैल चुका है! 

मिलना तो बीते कई सालों में कई बार हुआ, छोटे, संक्षिप्त टुकड़ों में, मगर लौटना जैसे पहली बार। जब भी आई खुद को कहीं दूर रख कर आई! एकदम खाली हाथ! हॉलो... वह थी मगर माँ की नीलांजना नहीं, कोई और, अजनबी आँखों वाली एक अपरिचित। वह जानती थी, उसकी नज़र बचा कर माँ उसे उसमें ढूंढती-टटोलती है और बेतरह निराश होती है मगर कहती कुछ नहीं। दोनों के बीच अकहे की एक ऊंची, मजबूत दीवार है जो समय के साथ-साथ और खींचती जा रही। वह मिलना अलग हो जाने का एहसास और शिद्दत से कराता था। इसलिए एक टॉर्चर था, शायद उन दोनों के लिए। वह आती थी बस लौटने के लिए और लौटते हुये एक बार फिर आने का रास्ता देखती थी। अपनी पीठ पर चिपकी माँ की उदास आँखें, अडोल चुप्पी लिए… वह चार कदम का सफर भी बहुत मुश्किल हो जाता था। 

एक दिन चली गई थी वह, सीने पर दुख का भारी बस्ता उठाए। कई बार खुद को सज़ा दे कर दूसरों को सज़ा दी जाती है, कुछ इसी तरह! माँ से दूर जाना था, यह सबसे मुश्किल सफर था जीवन का। मगर निर्मम भी शायद उसी से सबसे अधिक हुआ जा सकता है जिससे जान की तरह प्यार करते हैं... बाबूजी गुज़र गए थे और माँ का हमेशा का विधवाओं का-सा रूप और उजार हो उठा था। उसे टूट-टूट कर रोते देख उसका मन एक अजाने आक्रोश से भर उठा था। किस बात का शोक मना रही वह! जीते जी तो बाबूजी उनके दो बोल के लिए तरस गए!... उसने देखा था बाबूजी का अंतिम दिनों का अकेलापन। उन-सा मजबूत व्यक्तित्त्व का उस तरह निरीह हो उठना... सहता नहीं था! किस तरह छोटी-छोटी बातों के लिए घंटों माँ का रास्ता देखते थे! मगर माँ को अपने आकाश से, अपने स्तब्ध एकांत से फुर्सत कहाँ थी। सालों जाने उनमें क्या ढूँढती फिर रही! इस शून्य की खोज में उनसे उनका क्या-क्या खो गया है, काश कभी सोचती! खुद में रहना, हर वक़्त!... कोई कितना आत्म केंद्रित हो सकता है! जिस ज़मीन पर घर है उसमें बसर नहीं, सितारों में ठिकाने की तलाश... 

वह आक्रोश भरी आँखों से माँ का कमरा, उनमें हर तरफ बिखरी किताबों और गाने के रिकार्ड्स देखती। यह सब उसे, बाबूजी को माँ से अलग करते हैं। उन्हें इन किताबों से नफरत होने लगी थी। क्यों माँ का कमरा हर औरत की तरह उन सबका कमरा नहीं है! क्यों वह सबसे अलग-थलग अपनी एक अलग दुनिया में रहती है! इस दुनिया में किसी का भी आना वर्जित क्यों है! 

वह हर बच्चे की तरह अपने माँ-बाप के बीच सोना चाहती थी। यह दुनिया की सबसे  सुरक्षित जगह होती है। मगर उसे तो घर के दो कोनों के दो अजनबी कमरों के बीच सालों शटल की तरह टकराते रहना पड़ा। वह लगातार दरवाजा खटखटाना और इंतज़ार में रोते हुये खड़ी रहना...  बीच में था उसका कमरा जो हर बच्चे की तरह उसके लिए भी हर रात डरावना हो उठता था। दिन के उजाले में मासूम-से लगते खिलौने रात का अंधेरा घिरते ही कोई और हो जाते थे। उसकी प्यारी जलपरी ‘नोडा’ का ड्राकुला बन जाना सबसे अधिक आतंकित करता था। बचपन का वह दुखता हिस्सा वह किसी इरेज़र से पूरी तरह मिटा देना चाहती थी हमेशा के लिए। बचपन की तस्वीर ऐसी ही है उसकी- जगह-जगह से रगड़ कर मिटाई हुई, उधड़ी, फटी हुई... मगर कोई हिस्सा है जो साबुत है और समय-असमय फरफरा उठता है!

माँ का दरवाजा शायद ही कभी उसने खटखटाया। सख़्त मनाही थी। दिन भर की व्यस्तता के बाद रात पूरी तरह उनकी होती थी। उनके लिखने-पढ़ने का समय, शब्दों की दुनिया में भटकते फिरने का समय। सुबह की उजास फैलने के साथ ही अक्सर उनके कमरे की बत्ती बुझती थी। तकिये में मुंह दबाये पसीना-पसीना होते हुये वह यही सोच कर तसल्ली कर लेती थी कि बगल के कमरे में माँ है और वह जाग रही है। 
जब भी बाबूजी के कमरे में गई वह उसे लिपटा कर तुरंत खर्राटा भरने लगे। शाम से ही वह तरह-तरह की नमकीन और चीज़ के प्लेटस सजा कर पीने बैठ जाते थे और दस-ग्यारह तक कुछ खा कर सो जाते थे। सुबह चार बजे से उनका दिन शुरू होता था। मॉर्निंग वॉक, बर्जिश, योगा... ठीक तब जब माँ सोने जाती थी। एक ही समंदर के एक-दूसरे से अंजान दो अलग-अलग टापू की तरह थे वह दोनों। साझी छत के नीचे उनके बीच उसके सिवा कुछ भी साझे का नहीं था। इसलिय वह दो हिस्सों में बंट कर रह गई थी। 


याद है, जब वह बहुत छोटी थी, माँ-बाबूजी जाने क्या-क्या बोलते रहते थे एक-दूसरे से। दबी-घुटी आवाज़ में। अक्सर एक कमरे में बंद हो कर। बाद में उनके बीच कोई बात नहीं रही, शायद बची ही नहीं। खुद को एक-दूसरे पर उझेल कर उम्र भर के लिए फारिग हो गए। उसकी जानकारी में उनके बीच की चुप्पी फिर कभी नहीं टूटी। गिरती शाम बाबूजी के कमरे से टीवी से फूट बॉल, क्रिकेट मैच या रेस्लिंग का शोर गूँजता रहता और माँ के कमरे से सितार की हल्की, उदास धुन। उन्हीं के बीच वह एक बेतरतीव पौधे की तरह बड़ी हुई है, देह से सघन मगर अंदर से बोंसाई! अबेला फलों से लदी एक अस्वाभाविक, कृतिम पेड़ जैसे... उसके बचपन के बाद जवानी नहीं आई, सीधे बुढ़ापा आ गया, देह से अधिक मन में।     

माँ के इस कमरे के प्रति एक दुर्वार कौतूहल से वह भरी रहती थी। किसी की माँ के पास उनका अपना कमरा नहीं होता। उसके किसी दोस्त के घर उसने नहीं देखा। ‘नीलांजना की माँ सबसे अलग है, लेखक है!’ उनके स्कूल के एक फंक्शन में माँ मुख्य अतिथि बन कर आई थी तब उसके क्लास टीचर ने सबके सामने कहा था। कई लोगों को माँ को घेर कर उनका ऑटोग्राफ लेते देख उसे पहली बार अच्छा लगा था, गर्व-सा कुछ! वर्ना इसी लेखन के चलते उसे एक ठंडे, उदास घर में वर्षों जीना पड़ा था। जब औरों की माँयें तीज-त्योहार में सज-संवर कर गीत गातीं, पेड़ों के इर्द-गिर्द घूम-घूम कर धागे बांधतीं, माँ लोकल लाइब्ररिज़ की अलमारियाँ खंगालती फिरती, किताबों के ढेर में सर डाले बैठी रहती। सबके घर पुआ-गुझिया बनते, वह डायनिंग टेबल पर रखे कैसेरोल से सब्जी की तहरी, साबुदाना खिचड़ी निकाल कर खाती। कभी-कभी बाबूजी आइसक्रीम, पिज्ज़ा के लिए जो ले जाते, बस वही उसकी तफरीह हुआ करती थी।

बाबूजी का तबादला बीच में किसी और जगह हो गया था। तब माँ ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था। जाते हुये बाबूजी ने उसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया था। वह बहुत रोई थी। जाते हुये बहुत उम्मीद से मुड़-मुड़ कर देखती रही थी मगर माँ अहल्या की तरह प्रस्तरवत खड़ी रही थी। उस बात के लिए वह आज भी माँ को माफ नहीं कर पाई है। उसके निसंग, उपेक्षित बचपन के लिए वही दायी है! अपने भीतर के उसी धू-धू करते अकेलेपन से छूटने के लिए वह जाने कहाँ-कहाँ गिरती-उलझती चली गई... और आज सब कुछ खो कर पूरी तरह से निःशेष वह यहाँ, इस अस्पताल के कमरे में खड़ी है, अपनी माँ की वही छोटी-सी नीलांजना बन कर, उनकी तरफ जाने किस उम्मीद से एक बार फिर देखते हुये!

नदी के निरंतर आघात से घिस गए किसी पत्थर-सा हो गया है माँ का चेहरा- एकदम पारदर्शी, चिकना, रंगहीन! त्वचा के नीचे चमकती नसें आँखों के पास घनी और गहरी होती हुईं... हर सांस के साथ जैसे जोड़-जोड़ अलग हो बिखरने लगता है। देखते हुये वह डर के बवंडर में घिर आयी थी। जो अब तक एक सूचना मात्र थी अब वह अचानक से सच्चाई बन सामने आ खड़ी हुई है, कुछ इस भयावहता के साथ कि वह पोर-पोर अवश हो रही- माँ जा रही, इस बार हमेशा के लिए... कोई भी बहुत अपना एकदम से कहाँ जाता है जीवन से! किस्तों में जाता है, स्थगित, धीमे कदम मृत्यु की तरह... 

उसकी पुकार पर माँ ने आँखें खोली थी, एक घुली हुई कुहासा भरी दृष्टि! जाने कब तक देखती रही थी उसे उलझी-अबूझ नजरों से, जैसे पहचानने की कोशिश में हो और फिर अचानक चमक से भर गई थी- मुमु... जाने असक्त आवाज़ में उच्चारे गए इस अकेले शब्द में क्या था, वह सर से पाँव तक डबडबा आई थी। और तो कोई उसे इस नाम से नहीं पुकारता! मुमु इस दुनिया में वह सिर्फ अपनी माँ के लिए है...
इसके बाद वह बस रोती रही थी माँ की उठती-गिरती हड़ियल छाती से लग कर- यू हैव ऑलवेज़ बीन वेरी अनफेयर टु मी माँ... अब यह सब क्या है! तुमने मुझे कुछ बताया भी नहीं! उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुये माँ ने बार-बार फुसफुसाती आवाज़ में सॉरी कहा था। कितनी जिद्दी थी माँ, शंख के-से कठिन खोल में हमेशा ढँकी हुई! मगर आज इस तरह निरीह, वलनरेबल... असहनीय था उनका यह रूप। हारने के लिए तैयार बैठी हुई! एक बार तो रेसिस्ट करती!


लगभग सारा दिन फिर माँ से कोई बात नहीं हो पाई थी। वह डॉक्टर, नर्सों से घिरी रही थी। दवाई, डेटॉल से महकते कमरे में वह उनकी सफ़ेद यूनिफ़ार्म में सपाट दीवार-सी चमकती पीठ देखती बैठी रही थी, एक गहरा अक्षमता बोध लिए। उनके पीछे से अचानक उठती माँ की कराह, कोई बुदबुदाहट, कई बार अस्पष्ट-सी पुकार- मुमु... इस पुकार के लिए तो वह जन्मों से प्रतीक्षा में थी मगर आज उसके किसी काम नहीं आ सकती! चार कदम की दूरी पर वह दुनिया है जहां सब कुछ संभव है मगर यहाँ, इस कमरे में वह बिल्कुल लाचार है! जाते हुये डॉक्टर ने वही बात दोहराई थी, वह नहीं रहेगी! फंगल, बैक्ट्रियल इन्फ़ैकशन बढ़ता ही जा रहा, कभी भी दिमाग, लंग या पेट में रक्त श्राव शुरू हो सकता है! मगर हम उनका आखिरी सफर जहां तक हो सके आसान करने की कोशिश करेंगे...” उनके दयालु शब्द उसे बहुत निष्ठुर लगे थे। कुछ तो उम्मीद देते। इस विभत्स सच के साथ कैसे जीया जाता है। 
शाम माँ ने कहा था, एकदम ताज़ा आवाज़ में, ज़रा खिड़की के पर्दे हटा दे मुमु! बहुत दिन हुये सूरज का डूबना देखे। तकिये के सहारे बैठी सरके पर्दे के पार सुनहरी धूप से भरे आकाश की ओर देखते हुये उनका चेहरा कितना कोमल हो आया था! कंधे तक छँटे हुये बालों में बच्ची-सी दिख रही थी। ठीक जैसे स्कूल के दिनों में वह दिखती थी। सालों उसने सूर्यास्त के समय छत पर चुपचाप खड़ी माँ को देखा है। किरणों की सुनहरी किनारी में बंधी उनकी दुबली काया, आग के रेशे बन लहराते बाल... तब वह दूर आकाश में चमकते संध्या तारा-सी लगती थी- उज्ज्वल, उदास, बहुत एकाकी...

एक समय बाद मुड़ कर माँ ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया था- शिवेन नहीं आया! कैसा है वह? पहली बार माँ ने शिवेन का नाम लिया था। इससे पहले वह उसके लिए था ही नहीं। उनके लिविंग इन में रहने के वह शुरू से खिलाफ थी। आज पूछा भी तो कब! 

“हम अब साथ नहीं माँ...” सम्हालते हुये भी उसकी आवाज़ आखिर तक लरज़ गई थी। इन थोड़े-से शब्दों का उच्चारण कितना मुश्किल था! जो जी लेते हैं उसे कहने के लिए पृथ्वी भर का हौसला चाहिए होता है। सुन कर माँ ने कुछ नहीं कहा था, अपनी मुट्ठी में उसकी काँपती उँगलियाँ बांधे खिड़की के बाहर के तेजी से रंग उतरते आकाश के पार कहीं देखती रही थी। जब देर बाद रुक-रुक कर बोली थी, उसे सुनने के लिए उसे लगभग झुकना पड़ा था उनके चेहरे तक- जीवन बिछड़ने का, बिछड़ते चले जाने का सिलसिला मात्र है, एक चटक रंग कोलाज जिसका आखिरी सच शून्य है! इसकी आदत डाल लो, और कोई विकल्प नहीं... 

सुनते हुये उसके भीतर सब कुछ गल कर पानी होने लगा था जैसे। अलग जी लेना अलगाव का आदि हो जाना नहीं होता। विवशता सब कुछ करा लेती है, जीवन से अलग हो कर जीना भी... माँ आज जहां है, वहाँ से कहना शायद आसान है मगर जीवन रहते क्या जीवन से इस तरह निर्लिप्त हुआ जा सकता है! 

जिसके सामने एक उम्र से पत्थर बनती रही, आज जाने क्या हुआ कि एकदम से उसी के आगे किसी दुर्बल तटबंध-सी टूट गई।  फफक कर कहा, मेरे पास दो विकल्प थे माँ, या तो आगे बढ़ जाती या रुक कर थोड़ा और कोशिश करती। हर बार मैंने कोशिश करने का विकल्प चुना… अब जानती हूँ गलत किया। कुछ चीज़ें एक बार बिगड़ जाने के बाद कभी नहीं सुधरतीं, फटे दूध की तरह। जहां मन नहीं वहाँ हर संवाद फिज़ूल, कुछ भी दूसरे तक नहीं पहुंचता, बंद, अंधी गलियों से टकरा कर वापस लौट आता है। 

“सही किया कि कोशिश की वर्ना उम्र भर एक कचोट रह जाती। अधमरी उम्मीद बहुत तकलीफ देती है मुमु! कुछ जिंदा छोड़ आगे मत बढ़ो, पूरी तरह से निबट लो पहले नहीं तो यह उम्रभर किसी प्रेत-सा पीछे लगा रहेगा। कहते हुये माँ बेदम होने लगी थी। माँ के कंधे से टीकी पहली बार उसे लगा था, दुनिया में कुछ ही जगह ऐसी होती है जहां किसी भी समय लौटा जा सकता है। यह दरवाजे कभी बंद नहीं होते। 
जब तक बेटी रही, माँ को एक अलग ही कोण से देखती रही। आज एक औरत बन कर लौटी है तो यह माँ में छिपी औरत बेहतर समझ आ रही। कितना कुछ था जो अपनी नज़रों का जाला था...  सब कुछ साफ होते एक उम्र गुज़र गई! 

माँ को किसी तरह थोड़ा सूप पीला कर उसने उसे बिस्तर पर लिटा दिया था। नीले बल्ब की कमज़ोर रोशनी में माँ का चेहरा फिर कैसा बच्चों-सा दिख रहा... सबकी हर बात मानती, डरी हुई-सी... जिससे लड़ती रही वह कोई और थी- मजबूत, एक हद तक निर्मम! इससे लड़ा नहीं जा सकता। अब यह किसी और जन्म के लिए स्थगित रखना होगा। मगर कुछ सवाल हैं जिनका जवाब हर हाल में चाहिए। 

अस्पताल के लंबे, हल्के अंधेरे में डूबे कॉरीडोर में वह चुपचाप चलती है। सिगरेट की तेज़ तलब हो रही। अहाते का विशाल अमलतास सैकड़ों जुगनुओं-सा चमक रहा, हवा में उसकी निरंतर झर-झर की भुतैली आवाज़, कोई निचली मंज़िल में रुक-रुक के कराह रहा... रातों को जागने वाले उदास रूहों की एक अपनी दुनिया होती है! यहाँ की हवा में मृत्यु गंध है, हर तरफ बंधे नीरव में बीमार जीवन का धूसर अवसाद... 
एकांत में अब भी शिवेन का ख्याल आता है, आदतन। उसका सपाट चेहरा, अजनबी आँखें... उन्हीं में कभी उसके लिए रेशम हुआ कराते थे! भीतर अंधे कुएं-सा कुछ डबडबाता है, एक स्याह तकलीफ में पूरा वजूद हो आता है। जो चला गया है वह इस तरह क्यों रह गया है अब भी... उसके तराशे होंठों के बीच दबी सिगरेट के धुयें से अब भी उसका दम घुटता है, उसकी मर्दानी देह गंध से हर क्षण पोर-पोर नहाई रहती है। यह उसका सुख भी है, संत्रास भी! इस मौन यातना के सफर में अब उसे आजीवन होना है।    

वह कॉरीडोर के पार का तारों से भरा आकाश देखती है। किसी रात के अंधकार में एक तारा चुपचाप टूट जाता है। सब भूल जाते हैं उसे, मगर वह आसमान कभी नहीं जिसके सीने पर कभी वह जगमगाता था और जिसके चले जाने से उसका शून्य और-और गहरा हो गया है। हर तारा टूट कर अपने आकाश को एक कभी ना भरने वाला घाव दे जाता है... अंजाने उसके कदम तेज़ हो गए थे, वह बहुत दूर निकल जाना चाहती है मगर इन स्मृतियों की हद बेहद है। लगातार भागते हुये वह इतना तो जान गई है, अब रिहाई की उम्मीद नहीं, बस बचा है तो एक इंतज़ार-सा कुछ कि शायद कभी...!  

अब वह जानती है, प्रेम हिंसक होता है! एक समय के बाद अधिकांश अपने प्रेम पात्र को साबुत रहने देना नहीं चाहते। उसकी परछाई तक को हथिया लेना चाहते हैं। वर्चस्व की लड़ाई! देख नहीं सकते किसी को उसकी संपूर्णता में, नीजता में। किसीका कुछ भी उसका क्यों हो! बातों से, सवालों से तलाशी जारी रहती है- मन के गुप्त आले, तहखाने, कोई चोर जेब- कहीं कुछ बचा तो नहीं रह गया ! कोई याद, स्पर्श, गंध… 

अद्भुत यंत्रणा है यह। गीली लकड़ी-सा मन धुआँता रहता है। सुकून के समानान्तर चलता रहता है कुछ बेचैन, असह्य, अस्थिर-सा... प्रेम हमें कितना असुरक्षित, निर्बल बना देता है! एक अनुभूति, जिसे छू तक नहीं सकते, उसे हम सात तालों में बंद कर रखना चाहते हैं, दरवाजे जड़ना चाहते हैं उस पर! समर्पण से हमें आश्वस्ति नहीं मिलती। यह पाना हमें एक नए अभाव, नई तरह की असुरक्षा से भर देता है। आश्वस्त तो मन कभी नहीं होता। गोया यह कोई तलहीन कुएं-सा है, भरने के साथ-साथ खाली होते जाना इसकी नियति!        । 

 थक कर लौटी तो माँ जग रही थी। उन्हें हल्का बुखार है। अभी-अभी एक नर्स उन्हें देख कर गई है। उनकी नाक से खून बहने लगा था। बगल के टेबल पर रखी ट्रे में खून से सने रुई के गोलों का ढेर है। वह उधर देखने से बचती है। जो देख-सह नहीं सकती, जीवन उसी के मुक़ाबिल बार-बार ला खड़ा करता है। माँ मुस्कराने की कोशिश कर रही, शायद उसे आश्वस्त करने के लिए। उनके पपराए होंठ कृत्तिम ढंग से खींचे हुये हैं। वह उनके दुर्बल हाथ थामे उन पर फैले लाल, बैजनी धब्बों को देखती रहती है, त्वचा पर खून का रिसाव... माँ अपने रक्त में धीरे-धीरे डूबती जा रही... पूरा शरीर जैसे पिन से छीदा हुआ है, नन्ही-नन्ही सूर्ख बूंदों से भरा। यह देह कभी उसके सुख का अकेला घर हुआ करता था... माँ के सीने में मुंह धंसा कर, पेट में दुबक कर सोने की स्मृति अब भी उसे एक सुखद ऊष्मा से भर देती है। मगर... उन्होंने अधिकतर उसे उस सुख से वंचित रखा। भीतर फिर से रुलाई भरने लगती है। ऐसा क्यों है कि जब भी कोई उसे सताता है, उसे गुस्सा माँ पर ही आता है! शायद अपना सब कुछ उढेल देने की यही एकमात्र जगह है, इसलिए...

अचानक माँ अस्वाभाविक उछाह से पूछती है, मुमु तुझे रांगा मासी याद है ना! आज बहुत दिन बाद तुझे देखा तो उसका ख्याल आया। इस उम्र में बिलकुल तेरी तरह दिखती थी। मेरी अकेली दोस्त...  
रांगा मासी माँ की छोटी बहन थी, सालों पहले गुज़र गई। माँ रुक-रुक कर लगातार खाँस रही थी। उसने माँ को थोड़ा गरम पानी पिलाया था। बहुत मुश्किल से। उनसे निगला नहीं जाता। अंदर सब मूँद गया हो जैसे। “अब सोने की कोशिश करो!” उसने दो-तीन बार अपनी बात दुहराई थी। माँ जैसे इन दिनों ठीक से समझ नहीं पा रही कही गई बातें। दिमाग पर ज़ोर लगाना पड़ता है। मगर माँ ने अचानक उसकी बात अनसुनी कर पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया था- बहुत थकान है मगर आज सोने का मन नहीं कर रहा। कितने अर्से के बाद इस तरह मिली है... वह बेतरह धौंकती माँ के सरहाने बैठ जाती है- कुछ कहना है? “नहीं! हाँ...” माँ शायद ब्लश कर रही। वह उसे चुपचाप देखती है। उसने माँ को कब से नहीं देखा! सामने ही तो थी...        

“जानती है, मैं सालों से मन ही मन तुझसे बतियाती रही हूँ... कितनी तो बातें हैं। जब तू बहुत छोटी थी, तब सब निर्द्वंद्व बता जाती थी, क्योंकि तब तू कुछ समझती नहीं थी, बाद में चुप हो गई जब तू बात समझने लगी, लगा सिर्फ बात नहीं, बात के मर्म को समझने की उम्र पर आ जा पहले...” माँ तकिये के सहारे उठ बैठी थी- “पहली बार लग रहा तू बड़ी हो गई! दुख हमें बड़ा करता है मुमु...”

बड़ा होना इस कीमत पर... कोई विकल्प होता तो नहीं चुनती यह कभी! सर सहलाते हुये वह माँ का चेहरा देखती है। उस पर दर्द का नील जमा है। दिन भर कराहती रही है नीम बेहोशी में। कैंसर का दर्द उसके हाड़-मज्जे को खोद कर खा रहा। पैर और हाथ का दर्द असहनीय है। खून का रिसाव बहुत बढ़ गया है। डॉक्टर ने फिर आगाह किया था, कभी भी दिमाग में, पेट में भारी श्राव शुरू हो सकता है। देह पर बस चमड़ी रह गई है। माँ को सुई से कितना डर लगता था कभी! और अब! दोनों कलाइयों में सुई, आई वी से नसें काला और सख्त हो कर स्ट्रा की तरह उभर आई हैं। अब आई वी लगाने के लिए उनके हाथों में नसें नहीं मिलती। आज सुबह ख़ास एनेस्थीसिस्ट को बुलाया गया था पैरों में नस ढूँढने, सूई चुभोते-चुभोते बिस्तर खून से लाल हो गया था मगर माँ जबरा भींचे पड़ी रही थी, शायद उसके लिए। माँ जानती है, उसे खून से डर लगता है। उसने अपनी जलती आँखें भींची थी, कभी माँ को इस हालात में देखना पड़ेगा, सोचा नहीं था। 

उसने कॉटन से माँ के होंठ भिगोते हुये धीरे से पूछा था- बहुत तकलीफ है ना माँ? माँ बिना कुछ बोले देर तक चुप रही थी और जब बोली थी, जाने किस खोह से आवाज़ आई थी- इसी दर्द के मैं काबिल थी शायद। मुझे इसी तरह मर जाना था... सब कुछ कहीं पहले से तय होता है...  जानती है, मन का संत्रास जब भीतर नहीं समाता, देह में रोग बन निकल आता है! इस तकलीफ में तो जाने कब से थी, देह में फूट यह अब निकली है। मगर ठीक है, अंत तो आना ही था एक दिन... एक क्षण रुक कर वह फिर बोली थी, फूलती सांसों के बीच- मैं अपनी स्मृतियों के साथ मरना चाहती हूँ, शुक्र है यह अब भी बची है मेरे पास, सपने तो कब के मर-खप गए... सुनते हुये वह भीतर से उमड़ने लगी थी, माँ जीवन के आखिरी छोड़ पर पहुँच गई है शायद तभी उनमें उम्मीद-नाउम्मीदी जैसा कुछ नहीं बचा! हर अहम,उम्मीद, विसाद या खुशी से अलग हो जाने की स्थिति में शायद इंसान मोक्ष या मृत्यु के क़रीब ही हो पाता है। 
   
“मुझे कभी क्यों नहीं बतलाया... तुम तो हर हाल में इतनी मजबूत, इतनी समर्थ लगती थी कि सच, मुझे तुमसे कई बार नफरत होने लगती थी... लगता था तुम्हारे पास मन ही नहीं!”
माँ का चेहरा मुस्कराने की कोशिश में फिर बिगड़ने लगा था- मन... बस इसका होना ही तो हर पीड़ा का कारण था! जानती है, बाथरूम में देर तक रो कर जब निकलती थी तो लिली की तरह ताज़ा, चमकीली दिखती थी। हम औरतें यह हमेशा से करती हैं... मेरा चेहरा देख तेरे बाबूजी का चेहरा ईर्ष्या से काला पड़ जाता था। यही मेरी जिद्द थी। यह प्रिटेन्स मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। दुनिया के दिये जिस तकलीफ से मेरा कलेजा पानी हुआ जा रहा था उसे दिखा कर मैं हर तरह से हार जाना नहीं चाहती थी। मुझे तोड़ने का पर्वर्टेड सुख मैं किसी को दे नहीं सकती थी, ना तेरे बाबूजी को ना... उसे!
 
बात के अंत तक आते-आते माँ झटके से रुक गई थी। चारों तरफ का सन्नाटा एकाएक गहरा उठा था। सालों की चुप्पी और संयम के बाद का यह असावधान क्षण! उसे हैरत हुई थी। उसने माँ को कभी इतनी लापरवाह नहीं देखा था। आवाज़ को सामान्य रखते हुये उसने धीरे से कहा था- उसे? कौन? दीपांकर अंकल? यह नाम जाने कितने अर्से बाद उनके बीच आया था! वर्ना तो वर्जित ही था उनके घर, एक अलिखित नियम था कहीं। इस नाम ने वर्षों उनके घर को स्तब्ध कर रखा था। 

माँ आँख मूँद कर गहरी-गहरी सांस लेती रही थी- तुझे सब पता है, नहीं? जवाब में उसने सिर हिलाया था, हालांकि माँ ने देखा नहीं था। कुछ समाज में आखिरी समय धर्म गुरुओं के सामने कन्फ़ैस करने का रिवाज है, शायद माँ ऐसी ही कोई ज़रूरत महसूस कर रही होगी इस समय। उसने झुक कर उसका चेहरा सहलाया था- मुझसे बात करो, तुम बेहतर महसूस करोगी। माँ जवाब में गहरी-गहरी सांसें लेती रही थी- सब समझा कर बताना आसान नहीं मुमु! कितनी बातें हैं, एक पूरे जीवन की... सोच कर थकान होने लगती है। फिर उन लंबी, काली सुरंगो से गुज़रना...! 
उसे दीपांकर अंकल की याद है। खूब गोरे, सुदर्शन। उससे बहुत प्यार करते थे। जब भी आते थे, चॉकलेट लाते थे उसके लिए। जाते हुये माँ की कोई ना कोई किताब मांग ले जाते थे। माँ अपनी अलमारी खोल देती थी उनके लिए- ले जाइए, इस घर में तो कोई मेरी किताब पढ़ने वाला नहीं, धूल खाती पड़ी रहती है। उन दिनों माँ खूब मुस्कराती थी। उनके उजले माथे पर उन्हीं दिनों बिंदी देखी थी, वर्ना जहां तक स्मृति है, उनका सूना माथा ही याद आता है।
“दीपांकर अंकल मुझे बहुत प्यार करते थे... नहीं?” उसने झिझकते हुये पूछा था। आज बात निकली है तो वह कुछ हिम्मत कर गई है। “हाँ! कहते तो थे, तुझे अपनी बेटी की तरह मानते थे... मगर... जाते हुये एक बार मुड़ कर नहीं देखा... अपनी बेटी को भी! माँ ने ना जाने कैसी आवाज़ में कहा था- शब्दों के रिश्ते ऐसे  ही होते हैं, थोड़े-से आंधी-पानी में कागज़ की पुड़िया की तरह गल जाते हैं!”

माँ ने पहली बार उसकी आँखों में सीधा देखते हुये कहा था। वह जान गई थी, आज कॉन्फेशन का दिन है। लगा था, आज अपनी सारी वर्जनाएं तोड़ वह दोनों दो औरत की तरह मिले हैं, बिलकुल समान जमीन पर, समान स्तर पर! आज बात हो सकती है...

“शब्दों का रिश्ता...” पूछते हुये वह संकोच से ठहर गई थी। “हाँ! बस शब्द ही शब्द- खोखले शंख-सीपी-से शब्द! अर्थ से शून्य! मक्कार नियत के सुंदर, चमकीले मुखौटे... कैसी विडम्बना है मुमु, जिन शब्दों में जीती रही उन्हीं से एक दिन इस तरह वितृष्णा हो गई! जानती है, सालों से कुछ लिखा नहीं! अपने सारे शब्द, भाषा उसी रिश्ते के साथ नदी में सिरा आई!” 

बाबूजी की मौत के बाद वह कई साल माँ से नहीं मिली थी। फोन पर कभी-कभार बात, बस! माँ नहीं चाहती थी वह शिवेन के साथ लिविंग इन में रहे मगर उसने परवाह नहीं की थी। उसे तो बस तोड़ना था, हर वह चीज़ जो माँ को तकलीफ पहुंचाए। उसकी हर हरकत पर माँ का स्तब्ध, शॉक्ड चेहरा उसे एक हिंसक संतोष से भर देता था। तकलीफ सिर्फ वही नहीं दे सकती! वह लौटाएगी उनका एक-एक किया... 

“बच्चे चाक पर धरी गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें सही आकार देना हम माँ-बाप का फर्ज होता है। इसलिए तुझे हर नुकसान देह बात से दूर रखा। मगर इसी में तू मुझसे दूर होती चली गई। मैं बेबस देखती रह गई मगर तेरा हित मेरी प्राथमिकता थी।“ 

माँ अब बहुत रुकरुक कर बोल रही थी। उसने उनका सपाट सीना सहलाया था-“क्या गलत हो गया माँ? बताओगी? फिर उसने उठ कर ड्रिप्स का बहाव ठीक किया था- बाबूजी तो कितने अच्छे थे! क्या तुम्हें घर-परिवार नहीं चाहिए था? अगर कैरियर ही सब कुछ था तो शादी क्यों की थी!” सालों से भीतर जमें पड़े सवाल एक झटके से जुबान पर आ गए थे।
“कैरियर!”... माँ इस बार घरघराती आवाज़ में हंस पड़ी थी- अपनी नौकड़ी, रिसर्च- सब छोड़ बड़ी साध-सपने के साथ इस घर में आई थी मगर अधिकतर औरतों की तरह रिश्ते के नाम पर मुझे ढेर-सी जिम्मेदारियों और उपेक्षा के सिवा कुछ नहीं मिला। सब कुछ अब भी तुझे बता नहीं सकती, बहुत लज्जाजनक है... मेरा कसूर इतना है कि मैंने एक अच्छी औरत की तरह वह सब कुछ चुपचाप स्वीकार नहीं किया। तेरे लिए मैं वह घर कभी छोड़ नहीं पाई, स्वीकार करती हूँ, यहाँ कमजोर पड़ी! एक औरत माँ के रूप में जितनी सबल होती है उतनी दुर्बल भी... मगर एक साइलेंट प्रतिरोध में मैं हमेशा बनी रही। कानूनी तलाक नहीं ले पाई मगर उनको त्याग ज़रूर दिया...  मेरा वह कमरा मेरे उसी साइलेंट असहयोग, अवज्ञा, आत्म सम्मान और निषेध का प्रतीक था। वह कमरा मुझे मेरे स्वतंत्र अस्तित्व का एहसास दिलाता था। मैं दुनिया की तमाम औरतों की तरह एक बंधुआ मजदूर बन रिश्ते की काल कोठरी में मर जाना नहीं चाहती थी...

 “
जाने किस ऊर्जा से भर कर माँ इतनी सारी बातें बिना रुके कह गई थी! मगर बात खत्म करते-करते एकदम बेदम हो गई थी। आँखेँ मूँदे गहरी-गहरी सांस लेती माँ के सुर्ख हो आए चेहरे की ओर देखते हुये वह देर तक स्तब्ध बैठी रह गई थी। कितना घना कोहरा था जो एकदम से छंटा था... 
             
उसने इस तरह खुद को रोप दिया था शिवेन में कि उखड़ी तो सारी जड़ें खुल गईं! प्रेम में किस हद तक परजीवी बन गई थी। अपना कुछ नहीं! एक अकेली सांस तक नहीं... उसके जीवन से निकाले जाने के बाद पानी के बाहर ऑक्सीजन के लिए गलफड़े खोल हाँफती मछली की-सी हालत है उसकी। कितनी असुरक्षित, कितनी बलनरेवल... बार-बार लगता है, शिवेन के बिना मर जाएगी! बहुत ग्लानिकर, बहुत शर्मनाक है यह सब! यह डर! यह पसलियाँ तोड़ती-मरोड़ती यंत्रणा! अपना कोई वजूद, कोई ज़मीन, कोई घर नहीं उसका, हर अर्थ में रिफ्यूजी है! किसी के बिस्तर का हिस्सा, दरवाज़े का पापोश, मर्दानी भूख का उगालदान... बस यही! इतनी ही उसकी औकात!  
उसे बहुत कुछ नहीं चाहिए था मगर कुछ आधा-अधूरा भी नहीं चाहिए था। जो हो वह मुकम्मल उसका हो... क्या इतना मांगना भी बहुत ज़्यादा था! इस संबंध में जो सबसे अधिक चोटिल हुआ वह आत्म सम्मान था। तुम किसी के लिए कुछ नहीं, कोई माने नहीं रखते, यह एहसास छाती में रात-दिन सलाख-सा चुभता है। उसे होना था कहीं, किसी के लिए, थोड़ा! बहुत थोड़ा सही... उसका वह ठौर, छोटा-सा घर खो गया था। काश! उसका भी माँ की तरह अपना कोई कमरा होता! 

माँ रात भर बेहोश-सी रही थी। हल्की-उथली सांसें और मद्धम कराह... हर घंटे कोई नर्स, कोई डॉक्टर आता, नसों में दवाइयाँ पंप की जाती, बिस्तर बदले जाते, बेड शोर से बने घाव साफ किए जाते... एक जीवित नर्क! यंत्रणा का गिजबिजाता कुंड! नींद-जगार के बीच लंबे दुःस्वप्न-सी रात बीती थी।

सुबह माँ को कुछ राहत थी। जूस पीलाते हुये उसने सहज पूछ लिया था- एक बात की तो आश्वस्ति है ना माँ, बाबूजी से ना सही, दीपांकर काकू से तुम्हें सच्चा प्रेम मिला, उन्होने तुम्हें समझा... 

सुन कर माँ के चेहरे की रेखाएँ कोमल बनी रही थीं- नहीं मुमु! यह सब मेरी किस्मत में नहीं था... आज मुड़ कर देखती हूँ तो जीवन के वह आठ-नौ साल एक झूठ, एक भ्रम के सिवा कुछ नहीं थे। जो पुरुष मित्र बन कर स्त्री के हाथ पकड़ उसे घर की दहलीज़ के बाहर ले जाता है, वह उसे मुक्ति का कोई आकाश नहीं देता, अक्सर बाज़ार में ले जा कर खड़ा करता है। जो घर के भीतर हैं वही मर्द बाहर भी हैं! यह दुनिया एक बीहड़ जंगल है मुमु! हर कोई मुखौटा लगा कर आखेट पर निकला हुआ है...“

सुनते हुये उसकी आँखें बह आई थीं- उनसे एक बार मिलने का मन नहीं करता? “बहुत बार, अक्सर... दूसरी तरफ मुड़ी माँ की आँखें गीली चमक से भर आई थीं- जानती है, दिमाग ने जो भी फैसला लिया, भीतर की औरत हर हाल, हर मौसम में उसी के इंतज़ार में खड़ी रही। एक दिन मैं ठहर गई, वह बिना मुड़े आगे बढ़ गया मगर मेरे भीतर की यात्रा उसी की ओर रही, उसी के साथ! आज भी हर सांस उसी के रास्ते पर हूँ...  क्या करूँ, प्रेम कोई निर्णय नहीं होता ना...

“क्या हुआ तुम दोनों के बीच?” वह अपने अंजाने रोये जा रही थी।
“कुछ नहीं! एक दिन वह ऊब गया। उसका अडवेंचर खत्म हुआ और वह अपनी दुनिया लौट गया...”
“इतना आसान था यह सब!” सुनते हुये आक्रोश में वह रोना भूल गई थी।
“हाँ होता है, मर्दों के लिए! वह सुबह के भूले होते हैं... उन्हें बस लौटना होता है, हर दरवाजा उनके लिए हमेशा खुला होता है। मगर औरत के पास यह विकल्प नहीं होता। बस एक ही रास्ता, कोई दो रास्ता नहीं। वह या तो आ सकती है या जा सकती हैं। मैं एक सोने के हिरण के पीछे निकली और हमेशा के लिए बीहड़ में खो गई और वह... तफरीह कर अपने घर लौट गया... यहाँ हर पत्थर, हर धिक्कार औरत के लिए होता है, इस मामले में दुनिया अब भी उतनी ही बर्बर, उतनी ही आदिम है... ”  
“तुम्हें गुस्सा नहीं आता, उसने यह किया तुम्हारे साथ?”
“आता है, मगर उससे अधिक खुद पर! मैंने उसे मेरे साथ यह सब करने दिया!”
“आगे? फिर?”
“फिर... उसने मुझे खुद से इस तरह, इतनी दूर धकेल दिया कि एक दिन मुझे वह वनवास रास आ गया। मैं रोज़ रोती थी मगर अब लौटने को तैयार नहीं थी... आज जब मुड़ कर देखती हूँ, सब साफ नज़र आता है, उसने बहुत योजनाबद्ध तरीके से यह सब किया। घात का वही हमेशा का खेल, कुछ भी तो नया नहीं।”
“तो तुम्हें इस संबंध से भी कुछ ना मिला?”
“मिला क्यों नहीं, मैं जो कुछ भी बन सकी, मुझे मेरे दर्द ने बनाया... इतना तो स्वीकारना ही पड़ेगा! कई उपन्यास, कहानियाँ, पुरस्कार... सब इन्हीं रिश्तों का हासिल...”

वह सरक कर माँ के बिस्तर पर बैठ गई थी- माँ! मुझे अपने कमरे की चाभी दोगी?” सुनते ही माँ ने दोनों बाँहें बढ़ा कर उसे अपने सीने पर खींच लिया था। अचानक वह बेतरह रोने लगी थी- तुझे तो चाँद-सितारे, दुनिया की हर खुशी देना चाहती हूँ मुमु! मगर आज तुझे यह कैसी ज़रूरत आ पड़ी... दोनों देर तक सुबकते रहे थे। फिर माँ सम्हली थी- मगर एक बात, काला पानी की काल कोठरियों की तरह उस कमरे में उदासी है, बहुत अकेलापन है, सन्नाटा है मगर आत्म सम्मान का एहसास भी है। उस कमरे की छत, ज़मीन अपनी है! उसके बंद दरवाज़े एक औरत का निषेध है। उसके ‘हाँ’, ‘ना’ कहने का हक़! मैंने वह दरवाजा बंद कर खुद को क़ैद नहीं किया, हर अनचाहे को बेदखल किया!

वह उठ कर बाथरूम से मुंह धो आई थी। उसे थोड़ी देर के लिए निकलना होगा। बैंक में काम है। माँ जाने कैसी चाह भरी आँखों से उसे तैयार होते देखती रही थी- एक बात मुमु! तेरे बाबूजी के आखिरी दिनों में हम दोनों दोस्त हो गए थे। तू नहीं थी, वह बीमार थे, हालात, ज़रूरत, अकेलापन- जो भी कह ले, हमें एक हद तक पास ले आया था। हम दोनों ही शायद चुप रहते, अकेले रहते थक गए थे। हर बात की तरह नफरत की भी एक सीमा होती है। अब इसके लिए कोई ऊर्जा नहीं बची थी हम में। कोई मुद्दा भी ना था। एक समय के बाद सब निरर्थक लगने लगता है। जिस दिन वह गए, हम दोनों साथ बैठ कर फिल्म देख रहे थे। कुछ देर पहले मैंने उसे सूप पिलाया था... 
“ओह! सच माँ!” उसने माँ के गाल चूम लिए थे- मैं हमेशा तुम दोनों को साथ देखना चाहती थी...”

माँ मुस्कराई थी- और एक बात, हम दोनों के बीच जो भी रहा हो, तेरे बाबूजी तुझसे प्यार करते थे, उन्हें उसी रूप में याद रखना। नफरत, गुस्सा हमें ही बीमार करते हैं... बात पूरी करते-करते उनका चेहरा अचानक अजीब होने लगा था। वह उसकी ओर बढ़ ही रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई थी और वह मुड़ कर बाहर आ गई थी। बाहर दीपांकर काकू खड़े थे, हाथों में फूलों का गुलदस्ता लिए। उन्हें देखते ही वह पहचान गई थी। बाल पकने के सिवा और अधिक कोई बदलाव नहीं था। मगर उन्होने शायद उसे नहीं पहचाना था। हल्के संकोच के साथ कहा था, मैं मीरा मजूमदार से मिलने आया हूँ, यह उन्हीं का कमरा है... प्लीज़ उनसे कहिए...

उनकी बात पूरी होने से पहले ही वह कमरे में आ कर माँ से बोली थी, माँ दीपांकर काकू तुमसे मिलने... मगर माँ ने भी उसकी बात पूरी होने नहीं दी थी, गहरी-गहरी सांस लेते हुये उसे हाथ उठा कर रोक दिया था- नहीं! वह मुझसे मिलने नहीं, अपना बोझ हल्का करने और मेरी यात्रा मुश्किल करने आया है। उससे कहो, चले जाय!
वह बाहर लौटी थी- माँ आपसे मिलना नहीं चाहती! कृपया आप चले जायें! इस दो टूक बात की शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी, सकपका कर आगे बढ़े थे- ओह मुमु! उससे कहो दीपांकर... उनकी बात ख़त्म होने से पहले ही भीतर कुछ गिरने की आवाज़ आई थी और वह मुड़ कर बदहबास कमरे की ओर भागी थी। कमरे में फर्श पर दवाई की शीशियाँ चारों तरफ टूट कर बिखरी थीं और बिस्तर पर सीधी पड़ी माँ की आँखें दरवाज़े की ओर देखते हुये पथराई हुई थी। उसने एक नज़र में समझ लिया था, माँ मर गई है!  

उसकी चीख की आवाज़ सुन दीपांकर कमरे के भीतर दौड़ आया था मगर उसने मुड़ कर उन्हें दहलीज के पास ही रोक दिया था- नहीं का अर्थ नहीं  होता है दीपांकर काकू! माँ आपसे मिलना नहीं चाहती... 

कई नर्सें, डॉक्टर उसी समय कमरे में घुस आए थे। उनके पीछे दीपांकर छिप-से गए थे। उसने मुड़ कर माँ की ओर देखा था। माँ की अधखुली मुट्ठी में उनके कमरे की चाभी चमक रही थी! वह उसे अपने काँपते हाथ में ले कर एक पल के लिए अनायास मुस्कराई थी और फिर सीने पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी थी। माँ उसे उसकी विरासत सौंप गई थी! अब वह बेघर नहीं! उसके पास उसका अपना कमरा है- उसकी माँ का कमरा!
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जयश्री रॉय 

जन्म: 18 मई, हज़ारीबाग, झारखंड
शिक्षा:  एम. ए. हिन्दी (गोल्ड मेडालिस्ट), गोवा यूनिवर्सिटी 
प्रकाशित किताबें:  
‘कहानी संग्रह: 
 ‘अनकही’,  ‘तुम्हें छू लूँ ज़रा’, ‘खारा पानी’, कायांतर’, ‘फुरा के आँसू और पिघला हुआ इंद्रधनुष’, ‘गौरतलब कहानियाँ’, ‘मोहे रंग दो लाल’, उदास नीले दिन', 'ज़ून, ज़ाफ़रान और चाँद की रात', ‘एक रात’, ‘निस्संग’
उपन्यास:
‘औरत जो नदी है’, ‘साथ चलते हुये’, ‘इक़बाल’, ‘दर्दजा’।
कविता संग्रह:
‘तुम्हारे लिए’
सम्पादन:
 ‘हमन हैं इश्क़ मस्ताना’
(प्रेम कहानी संग्रह)
 ‘अगिन असनान’. 
( प्रेम कहानी संग्रह)
'एक दस्तक'
(स्त्री प्रतिरोध की कहानियाँ)
‘गवाही
(स्त्री विमर्श की कहानियाँ)
प्रसारण:  आकाशवाणी से रचनाओं का नियमित प्रसारण।
सम्मान:  युवा कथा सम्मान (सोनभद्र), 2012, स्पंदन कृति सम्मान, 2017, स्पंदन सोशल  क्रिएटिव अवार्ड, 2018, शिक्षाविद पृथ्वी भान श्रेष्ठ कथा संग्रह सम्मान, 2019, दिनकर साहित्य सम्मान( जयते फाउंडेशन), 2017, सूरज प्रकाश मारवाह 'साहित्य रत्न अवार्ड' 2020
संप्रति :  कुछ वर्षों के अध्यापन के बाद स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क:   jaishreeroy@ymail.com


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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